Spread the loveदेहरादून। दैनिक प्रभातवाणी । उत्तराखंड सरकार ने स्कूल शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में एक बड़ा और सख्त प्रशासनिक निर्णय लिया है। स्कूल शिक्षा महानिदेशक आकांक्षा कोंडे द्वारा जारी आदेश के तहत प्रदेशभर में विभिन्न कार्यालयों, खंड शिक्षा कार्यालयों तथा सुगम विद्यालयों में वर्षों से संबद्ध (अटैच) किए गए शिक्षकों एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों के सभी अटैचमेंट तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिए गए हैं। इस आदेश के बाद अब सभी संबंधित कर्मचारियों को 30 जून 2026 तक अपने मूल विद्यालयों में लौटकर कार्यभार ग्रहण करना अनिवार्य होगा। शिक्षा विभाग ने स्पष्ट किया है कि निर्धारित समय सीमा तक मूल तैनाती स्थल पर कार्यभार ग्रहण नहीं करने वाले कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी। इसमें वेतन रोकने, अनुशासनात्मक कार्यवाही तथा निलंबन जैसे कदम भी शामिल हो सकते हैं। विभाग ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों और संबंधित अधिकारियों को आदेश का शत-प्रतिशत पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए हैं। प्रदेश में लंबे समय से यह शिकायत सामने आती रही थी कि अनेक शिक्षक और कर्मचारी राजनीतिक अथवा प्रशासनिक प्रभाव के आधार पर दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों से सुगम एवं शहरी विद्यालयों या कार्यालयों में संबद्ध होकर कार्य कर रहे थे। इसके कारण दूरस्थ ग्रामीण विद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई थी और विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। सरकार का मानना है कि अब इस व्यवस्था को समाप्त करने से वास्तविक आवश्यकता वाले विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ेगी और शिक्षा व्यवस्था अधिक संतुलित होगी। विभागीय सूत्रों के अनुसार इस निर्णय से प्रदेशभर में 300 से अधिक शिक्षक एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारी प्रभावित होंगे। इनमें बड़ी संख्या उन कर्मचारियों की बताई जा रही है जो लंबे समय से मूल विद्यालयों में वापस नहीं गए थे। अब सभी को अपने मूल तैनाती स्थल पर लौटना होगा ताकि विद्यालयों में रिक्त पदों की समस्या को कम किया जा सके। शिक्षा विभाग का कहना है कि पहाड़ी क्षेत्रों के अनेक विद्यालय वर्षों से शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। कई स्थानों पर एक या दो शिक्षकों के भरोसे पूरा विद्यालय संचालित हो रहा था, जबकि कुछ शिक्षक मैदानी क्षेत्रों में संबद्ध होकर कार्यरत थे। ऐसे में विद्यार्थियों की नियमित पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। नए आदेश का उद्देश्य इन विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षकीय व्यवस्था सुनिश्चित करना है ताकि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। हालांकि विभाग ने इस आदेश में एक महत्वपूर्ण अपवाद भी रखा है। जिन शिक्षकों को उनके मूल विद्यालय में छात्र संख्या शून्य होने के कारण दूसरे विद्यालय में संबद्ध किया गया था, उन्हें इस आदेश से छूट दी गई है। ऐसे मामलों में पूर्व व्यवस्था यथावत लागू रहेगी ताकि प्रशासनिक कार्यों और शैक्षणिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। इसी क्रम में उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा विभाग ने भी समान निर्णय लेते हुए डिग्री कॉलेजों तथा पॉलिटेक्निक संस्थानों में चल रहे सभी प्रोफेसरों एवं कर्मचारियों के संबद्धीकरण को समाप्त करने के निर्देश जारी किए हैं। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि राज्य सरकार शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए सभी शिक्षा विभागों में एक समान नीति लागू कर रही है। शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह निर्णय आगामी वार्षिक शिक्षक तबादला प्रक्रिया को भी अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनाएगा। 1 जुलाई से शुरू होने वाले तबादला सत्र से पहले सभी शिक्षकों का अपने मूल विद्यालयों में होना आवश्यक माना गया है, ताकि वास्तविक रिक्तियों का सही आकलन किया जा सके और स्थानांतरण प्रक्रिया निष्पक्ष ढंग से संचालित हो। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आदेश का प्रभावी ढंग से पालन कराया गया तो इसका सबसे बड़ा लाभ दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों के विद्यार्थियों को मिलेगा। लंबे समय से शिक्षकों की कमी के कारण जिन विद्यालयों की शैक्षणिक गतिविधियां प्रभावित हो रही थीं, वहां नियमित शिक्षण कार्य में सुधार आने की संभावना है। साथ ही यह निर्णय शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन स्थापित करने और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब पूरे प्रदेश की नजर इस बात पर रहेगी कि 30 जून की समय सीमा तक कितने शिक्षक और कर्मचारी अपने मूल विद्यालयों में लौटते हैं तथा विभाग आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित कराने के लिए कितनी सख्ती बरतता है। यदि आदेश का पूर्ण पालन होता है तो राज्य के दूरस्थ विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। Post Views: 2 Post navigation उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव: 1 जुलाई से खत्म होगा मदरसा बोर्ड, USAME संभालेगा नई जिम्मेदारी