UKSSSC पेपर लीक घोटाले पर CBI जांच की राह आसान? राज्य सरकार दे रही इशारे

देहरादून, 29 सितंबर 2025 /दैनिक प्रभातवाणी
उत्तराखंड में अभी-अभी एक बड़ा तमाशा उजागर हुआ है — UKSSSC (उत्तराखण्ड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग) द्वारा आयोजित स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा में कथित पेपर लीक की सनसनीखेज खबर ने पूरे राज्य को हिला कर रख दिया है। यह मामला सरकार, युवाओं और न्याय व्यवस्था के बीच खाई को और स्पष्ट करता दिख रहा है। आज इस खबर में हम आपको उपलब्ध तथ्यों के आधार पर विश्लेषण और संभावनाएँ पेश कर रहे हैं — बिना आडंबर के, सिर्फ सच्चाई के साथ।
पृष्ठभूमि: कैसे शुरू हुआ मामला
UKSSSC द्वारा विभिन्न पदों पर भर्ती के लिए ये परीक्षा आयोजित की गई थी। इस परीक्षा में कथित रूप से पेपर लीक की जानकारी सामने आने पर बेरोजगार युवाओं ने केंद्र और राज्य स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएँ दीं।
आरोप हैं कि परीक्षा की कॉपियाँ समय से पहले पाठ्यक्रम जानकारों के पास पहुंची, और उनमें आवश्यक परीक्षात्मक प्रश्न समाहित कर दिए गए गए।
मामला सार्वजनिक होते ही सरकार ने SIT (Special Investigation Team) गठित की, जो जांच कर रही है कि इस लीक में कौन-कौन लोग शामिल थे, कितनी कॉपियाँ पहले से वितरित हुईं और किस स्तर तक इसका दायरा है।
राज्य सरकार की प्रतिक्रिया: SIT से होती जांच, CBI को भी दी इशारा
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि राज्य सरकार SIT की कार्रवाई के समर्थन में है और यदि स्थिति उचित हुई तो CBI जांच को मंजूरी देने का निर्णय भी लिया जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा है कि:
SIT को बिना किसी दबाव के जांच करने की पूरी आज़ादी दी गई है;
यदि SIT की जांच में यह निष्कर्ष निकले कि मामले में राजनीतिक या प्रशासनिक स्तर तक गहरी साज-सज्जा है, तो केंद्र की एजेंसी (CBI) को मामला हस्तांतरित किया जा सकता है;
दोषी चाहे कोई भी हो, उन्हें कानून के अनुसार सजा दिलवाई जाएगी।
इस बयान में जनता को यह भरोसा देने की कोशिश है कि सरकार इस घोटाले को हल्के में नहीं ले रही है।
युवा शक्ति का विरोध: “हम सहन नहीं करेंगे”
परीक्षा लीक की खबर के बाद उत्तराखंड भर में बेरोजगार युवाओं का गुस्सा भड़क उठा है। उन्होंने विभिन्न जिलों— देहरादून, हरिद्वार, हल्द्वानी, ऊधम सिंह नगर, पौड़ी, पिथौरागढ़ — में धरना, र thrott protest, प्रदर्शन और पब्लिक संकल्प यात्राएँ निकाली हैं।
उनकी मुख्य माँगें हैं:
तेज़ और निष्पक्ष कार्रवाई — जितनी जल्दी हो सके सभी आरोपियों को गिरफ्तार करना;
कड़ी सजा — आरोपियों को केवल बर्खास्ती नहीं बल्कि सजा, जुर्माना और संपत्ति कुर्की तक की कार्रवाई हो;
भविष्य की भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता — तकनीकी सत्यापन, मॉनिटरिंग और तीसरे पक्ष की ऑडिटिंग अस्थायी नहीं, बल्कि निरंतर प्रक्रिया हो;
CBI जांच की मांग — क्योंकि SIT की सीमाएँ हो सकती हैं, इसलिए जांच केंद्रीय एजेंसी को देनी चाहिए।
प्रदर्शनकारियों का कहना है, “SIT से क्या भरोसा? अगर राजनीतिक संरचना इसमें शामिल हो, तो जांच दब सकती है।”
SIT जांच की वर्तमान स्थिति
सरकार द्वारा गठित SIT ने अब तक कई अहम कदम उठाए हैं:
परीक्षात्मक केंद्रों, प्रश्नपत्र वितरण वाहनों, पुष्ट प्रमाणन एजेंसियों और सम्बद्ध दलों की सूचना तलब की है;
कई आरोपियों की प्रारंभिक पूछताछ हो चुकी है;
कुछ मामलों में गिरफ्तारी और जमानतियाँ हुई हैं;
संपत्ति की जांच और लैपटॉप, मोबाइल, डिजिटल डेटा फ़ोरेंसिक विश्लेषण प्रारंभ हो चुके हैं।
लेकिन, SIT को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:
साक्ष्यों की जटिलता — लीक से जुड़ी डिजिटल फाइलों, सीसीटीवी फुटेज, गवाहों के बयानों को जोड़ना आसान नहीं;
राजनीतिक दबाव की आशंका — यह आरोप लगाया जाता है कि मामले की जांच में ज़रूरी सहयोग बाधित हो सकता है;
समय की कमी — जितनी जल्दी निर्णय न लिया गया, उतना ज़्यादा विरोध बढ़ जाएगा।
इन चुनौतियों को देखते हुए युवा संगठन और विपक्ष भारी CBI जांच की मांग कर रहे हैं।
CBI जांच — क्या यह संभव है?
भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में CBI (Central Bureau of Investigation) किसी राज्य स्तर के मामले में तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब:
मामला अंतर-राज्यीय हो या
राज्य सरकार या उच्च न्यायालय CBI जांच की सिफारिश करे, या
केंद्र सरकार को अधिकार प्राधिकृत हो।
उत्तराखंड सरकार ने संकेत दे दिए हैं कि यदि SIT जांच से परिणाम जनता को संतुष्ट न करें, तो CBI को टास्क देना संभव है।
CBI को शामिल करने से निम्न लाभ हो सकते हैं:
जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित होगी — किसी दबाव की आशंका कम होगी;
उच्च स्तरीय अधिकारियों तक पहुँच संभव होगी— यदि साजिश बड़े स्तर पर हो;
राष्ट्रीय स्तर की संसाधन और विशेषज्ञ टीम इस जाल को तफ्तीश कर सकती है।
लेकिन, इसमें जोखिम और बाधाएँ भी हैं:
केंद्रीय हस्तक्षेप पर राज्य सरकार को राजनीतिक दबाव झेलना पड़ सकता है;
जांच लंबी हो सकती है— संसाधन, कानूनी प्रक्रियाएँ और स्तरीय अपीलें देरी लाएंगी;
केंद्र-राज्य के बीच सत्ता संघर्ष की संभावना बढ़ जाएगी।
फिर भी, यदि सरकार और विपक्ष साथ दें, तो CBI जांच की राह सहज हो सकती है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ: समर्थन और विरोध का संग्राम
इस मुद्दे ने राजनीतिक मोर्चे पर भी गरमागरम बहस छेड़ दी है:
विपक्ष कह रहा है कि SIT को दबाया जा सकता है, इसलिए CBI जांच अनिवार्य है।
कुछ दल यह आरोप लगा रहे हैं कि राज्य सरकार जानबूझकर मामला टालने की कोशिश कर रही है।
हालांकि, मुख्यमंत्री और समर्थक दल यह दलील दे रहे हैं कि SIT पर्याप्त है, और यदि जरूरत पड़ेगी तो CBI को बुलाना भी तैयार हैं।
इस बीच जनता, विशेषकर युवाओं की आवाज़ — जो खुद इस भर्ती प्रक्रिया का केंद्र हैं — राजनीतिक दलों पर दबाव बना रही है।
सुझाव और अपेक्षाएँ: आगे की राह
यदि दैनिक प्रभातवाणी की तरह निष्पक्ष मीडिया इस केस की रिपोर्टिंग करती रहे, तो निम्न बिंदुओं को प्राथमिकता मिलनी चाहिए:
पारदर्शिता बढ़ाएँ — SIT की रोज़मर्रा की गतिविधियों, गिरफ्तारी, पूछताछ और प्रगति को सार्वजनिक किया जाए;
तीसरा पक्ष ऑडिट — न्यायिक समिति या लोकायुक्त स्तर पर ऑडिट कराई जाए ताकि जनता को भरोसा हो;
युवाओं को संवाद में शामिल करें — शांतिपूर्ण मंचों पर वर्ग-वार फीडबैक और सुझाव लिए जाएँ;
भविष्य की भर्ती पद्धति सुधारें — ऑनलाइन कंप्यूटर आधारित परीक्षा, प्रश्नपत्र रैंडमाइजेशन, सील शिपमेंट, सीसीटीवी निगरानी का उपयोग;
संवेदनशीलता से कार्रवाई करें — जो भी दोषी पाए जाएँ, चाहे किसी उच्च पायदान पर हों, कार्रवाई में देरी न हो।
दैनिक प्रभातवाणी: सच्चाई की उम्मीद और जनता का हक
UKSSSC पेपर लीक मामला सिर्फ एक भर्ती परीक्षा का विवाद नहीं है — यह युवाओं की उम्मीद का प्रश्न है। अगर सरकार और जांच एजेंसियाँ समय रहते सही कदम उठाए, तो यह मामला एक मिसाल बन सकता है कि कैसे भ्रष्टाचार और साजिश को बेनकाब किया जाए।
SIT जांच जहां एक ज़रूरी कदम है, वहीं CBI की संभावना इसे और मजबूत कर सकती है — बशर्ते दोनों प्रक्रियाएँ पारदर्शिता, निष्पक्षता और न्याय की कसौटी पर खरी उतरें।
बेरोज़गार युवा इस समय सिर्फ कार्रवाई चाहते हैं, सिर्फ सच्चाई चाहते हैं — और यही उनकी आवाज़ है जो सत्ता और व्यवस्था को चुनौती देती है।