9 महीने बाद भी UPNL कर्मचारियों का भविष्य अधर में: सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी, हड़ताल और अवमानना याचिका की तैयारी

9 महीने बाद भी अधर में UPNL कर्मचारियों का भविष्य: सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी, हड़ताल और अवमानना की चेतावनी
लेखक: अजय सेमल्टी | प्रकाशक: दैनिक प्रभातवाणी
उत्तराखंड राज्य में कार्यरत उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम लिमिटेड (UPNL) के माध्यम से नियुक्त करीब 21,000 संविदा कर्मचारी आज एक असहज, अपमानजनक और अन्यायपूर्ण स्थिति में जीवन जीने को मजबूर हैं। इनमें बड़ी संख्या में वे युवा शामिल हैं, जिन्होंने राज्य सरकार की विभिन्न परियोजनाओं और कार्यालयों में पिछले 5 से 15 वर्षों तक सेवा की है। वे न तो स्थायी कर्मचारी माने जाते हैं, न संविदा का स्पष्ट दर्जा उनके पास है। हालाँकि, सितंबर 2023 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए इन्हें चरणबद्ध तरीके से नियमित किए जाने का आदेश दिया था, लेकिन आज, उस आदेश के 9 महीने बीत जाने के बाद भी न तो सरकार की ओर से कोई नीति सामने आई है और न ही कोई स्पष्ट कार्ययोजना।
यह स्थिति सिर्फ संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण राज्य प्रशासन की संवेदनशीलता, जवाबदेही और संवैधानिक मूल्यों के लिए एक गंभीर प्रश्न है। जो लोग वर्षों से सरकार के महत्वपूर्ण कार्यों में लगे हुए हैं—चाहे वह स्वास्थ्य विभाग हो, पुलिस प्रशासन हो, शिक्षा या वन विभाग हो—उनकी सेवाओं की कोई स्थायित्व नहीं है। उनकी स्थिति एक ऐसे अस्थायी मेहमान जैसी हो गई है, जिसे हर महीने यह डर सताता है कि कहीं कल से उसे बाहर न कर दिया जाए। और जब देश की सर्वोच्च अदालत ने भी यह स्वीकार कर लिया कि ऐसे कर्मचारियों के साथ अन्याय हो रहा है, तो फिर सरकार की यह उदासीनता क्या न्याय व्यवस्था की मूल भावना का अपमान नहीं?
UPNL की स्थापना और उद्देश्य
UPNL की स्थापना वर्ष 2003 में उत्तराखंड सरकार द्वारा पूर्व सैनिकों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। लेकिन वर्षों में इसकी परिधि और भूमिका का इतना विस्तार हो गया कि अब यह राज्य के लगभग हर विभाग में हजारों कर्मचारियों की नियुक्ति कर रही है। कई बार तो यह नियुक्तियाँ बिना किसी खुली विज्ञप्ति, परीक्षा या पारदर्शी चयन प्रक्रिया के होती हैं। यह स्वयं में एक गंभीर प्रश्न है, लेकिन उससे भी अधिक गंभीर है कि ये कर्मचारी वर्षों तक लगातार काम करते हुए भी किसी भी प्रकार की सेवा सुरक्षा, वेतनमान, चिकित्सा सुविधा, बीमा, पेंशन, और छुट्टी जैसे अधिकारों से वंचित हैं। राज्य के कई विभागों में ऐसे कर्मचारी 10–15 वर्षों से सेवा दे रहे हैं, लेकिन उनके पास न कोई सेवा पुस्तिका है, न भविष्य की कोई गारंटी।
UPNL की कार्यप्रणाली: संविदा या शोषण?
UPNL के तहत नियुक्त कर्मचारी पूरी मेहनत से सरकारी विभागों में कार्य करते हैं, लेकिन उन्हें न तो नियमित कर्मचारियों जैसे वेतन, भत्ते, पेंशन, ESI या PF की सुविधा मिलती है।
वर्तमान परिस्थितियाँ:
मासिक वेतन: ₹10,000 – ₹18,000 (विभाग व पद अनुसार)
कोई चिकित्सा बीमा नहीं
किसी प्रकार का सेवाकाल सुरक्षा नहीं
महिला कर्मचारियों को मातृत्व लाभ नहीं
कार्यावधि 10–15 वर्ष होने के बावजूद कोई स्थायित्व नहीं
इनमें से कई कर्मचारी तो राज्य सचिवालय, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, पुलिस, वन विभाग, जल निगम, ऊर्जा निगम आदि में वर्षों से कार्यरत हैं।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश (सितंबर 2023)
UPNL कर्मचारियों के नियमितीकरण की मांग को लेकर कई याचिकाएं वर्षों से अदालतों में लंबित थीं। अंततः सितंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा:
“राज्य सरकार संविदा कर्मियों के हितों की अनदेखी नहीं कर सकती। UPNL के माध्यम से वर्षों से सेवा दे रहे कर्मचारियों को चरणबद्ध ढंग से नियमित किया जाए।“
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को 6 महीने में नीति तैयार करने और कार्यान्वयन शुरू करने का आदेश दिया था।
सितंबर 2023 में जब सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया कि UPNL कर्मचारियों को चरणबद्ध तरीके से नियमित किया जाए, तो यह आदेश केवल एक कानूनी दिशा-निर्देश नहीं, बल्कि राज्य प्रशासन के लिए एक नैतिक जिम्मेदारी भी थी। कोर्ट ने यह माना कि इन कर्मचारियों को अस्थायी बनाकर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है, और इससे समानता तथा अवसर की गरिमा पर सीधा प्रहार होता है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य सरकार छह महीने के भीतर एक स्पष्ट नीति तैयार करे और उसे लागू करना शुरू करे। इस फैसले से हजारों कर्मचारियों के मन में एक नई उम्मीद जगी थी। उन्हें लगा कि अब वर्षों की सेवा का मूल्यांकन होगा, उनका जीवन बेहतर होगा, उनके बच्चों की शिक्षा और भविष्य को स्थायित्व मिलेगा। लेकिन दुर्भाग्यवश यह उम्मीद जल्द ही निराशा में बदल गई।
9 महीने बाद भी क्या हुआ?
आज नौ महीने बीत चुके हैं। न तो कोई सरकारी अधिसूचना आई है, न ही कोई समिति गठित हुई है। कर्मचारियों द्वारा आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारियाँ भी अधूरी, अपारदर्शी और टालमटोल करने वाली हैं। राज्य सचिवालय से लेकर ब्लॉक कार्यालयों तक कार्यरत इन कर्मचारियों की स्थिति वैसी ही है जैसी एक नाविक की होती है, जो तूफानी समुद्र में दिशा के बिना डगमगाता हुआ अपनी ही स्थिति से अनजान रहता है। यह न केवल प्रशासनिक अकर्मण्यता का प्रमाण है, बल्कि राज्य सरकार की उस संवेदनहीनता का भी प्रतीक है, जो वर्षों की सेवा के बावजूद अपने ही कर्मचारियों की आवाज नहीं सुन पा रही।
कर्मचारियों में आक्रोश: अवमानना याचिका की तैयारी
राज्य के विभिन्न जिलों में UPNL कर्मचारियों ने कई बार शांतिपूर्ण ढंग से ज्ञापन सौंपे, प्रदर्शन किए, मीडिया के माध्यम से अपनी पीड़ा बताई, लेकिन सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। अब कर्मचारी संगठन स्पष्ट शब्दों में कह रहे हैं कि यदि अगस्त के अंत तक कोई स्पष्ट कार्य नहीं किया गया, तो वे सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका (Contempt Petition) दाखिल करेंगे। इसके साथ ही राज्यभर में क्रमिक अनशन, कार्यालय बहिष्कार और अनिश्चितकालीन हड़ताल की भी तैयारी की जा रही है।
कर्मचारियों की ज़ुबानी – पीड़ा की कहानियाँ
कर्मचारियों की व्यक्तिगत कहानियाँ उनकी पीड़ा की साक्षी हैं। कई महिलाएँ मातृत्व अवकाश की मांग लेकर अपने अधिकारियों के चक्कर काटती रहीं, लेकिन उन्हें अस्वीकार कर दिया गया। कुछ कर्मचारियों ने कोविड महामारी के दौरान जान जोखिम में डालकर कार्य किया, लेकिन बाद में उन्हें कोई विशेष सुविधा नहीं दी गई। एक कर्मचारी ने बताया कि उसने अपने पद पर 12 वर्षों तक कार्य किया, लेकिन जब उसने स्थायीत्व की बात की तो विभाग ने उसे कह दिया – “आपके पास तो UPNL का नियुक्ति पत्र है, सरकार के आदेश का इंतजार कीजिए।”
नीरज भंडारी (ऑपरेटर, शिक्षा विभाग)
“मैंने 12 साल की सेवा दी है, फिर भी सिर्फ ₹14,000 मासिक मिलते हैं। जब भी सरकार से बात की, जवाब मिला – ‘देखते हैं’। क्या हम गुलाम हैं?”
सविता देवी (स्वास्थ्य सहायक, ब्लॉक कार्यालय)
“कोविड के समय हमने बिना छुट्टी लगातार ड्यूटी की। आज नियमित तो दूर, हमारी नौकरी भी खतरे में है।”
सुनील रावत (सुरक्षा गार्ड, सचिवालय)
“सरकार हमें स्थायी नहीं करती, लेकिन सचिवालय की सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी हमारे ऊपर है। ये दोहरा मापदंड क्यों?”
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ: मौन ही सबसे बड़ा बयान
इस पूरे परिदृश्य में सबसे निराशाजनक पक्ष यह है कि राज्य की राजनीतिक पार्टियाँ—चाहे सत्तापक्ष हो या विपक्ष—दोनों इस विषय पर मौन हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी युवाओं के हित और पारदर्शी शासन की बातें अपने हर भाषण में करते हैं, लेकिन इस मुद्दे पर अब तक कोई ठोस बयान नहीं आया है। वहीं, विपक्ष ने कुछ प्रश्न जरूर उठाए, लेकिन उन्हें संघर्ष का रूप नहीं दिया। कुछ विधायकों ने व्यक्तिगत समर्थन अवश्य जताया, पर वह भी बयानबाजी से आगे नहीं बढ़ा। क्या 21,000 कर्मचारियों और उनके परिवारों की उम्मीदें इतनी नगण्य हैं कि उनके लिए कोई आंदोलन भी न खड़ा किया जा सके?
सरकार: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मुद्दे पर अब तक कोई ठोस सार्वजनिक बयान नहीं दिया है।
विपक्ष: कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने विधानसभा में इस विषय पर ज़िक्र किया लेकिन कोई ठोस आंदोलन नहीं चलाया।
विधायक/सांसद: कुछ विधायक निजी तौर पर समर्थन जता चुके हैं लेकिन औपचारिक प्रस्ताव का अभाव है।
अन्य राज्यों की स्थिति: उत्तराखंड पीछे क्यों?
भारत के अन्य राज्यों में संविदा कर्मचारियों के लिए नीतियाँ तैयार की गई हैं। राजस्थान ने 10 वर्षों की सेवा के बाद संविदा कर्मियों को नियमित करने की नीति लागू की है। हरियाणा ने स्कीम वर्करों के लिए चिकित्सा सुविधा और न्यूनतम वेतन तय किया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने कुछ विभागों में संविदा कर्मचारियों को ‘पर्क्स’ और सेवाकाल सुरक्षा देना शुरू किया है। ऐसे में उत्तराखंड सरकार की चुप्पी यह दर्शाती है कि वह न तो संवेदनशील है, न ही दूरदर्शी। जब पूरे देश में संविदा व्यवस्था की समीक्षा हो रही है, तो उत्तराखंड को भी एक नई, पारदर्शी और न्यायपूर्ण नीति अपनानी चाहिए।
उत्तराखंड इन सबमें सबसे पिछड़ा नजर आता है, जबकि राज्य का गठन ही पूर्व सैनिकों और स्थानीय रोजगार के उद्देश्य से हुआ था।
UPNL की आलोचना: RTI से सामने आए तथ्य
कई पदों पर भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी
कुछ मामलों में नियम विरुद्ध नियुक्तियाँ
कर्मियों से एजेंसी फीस व कटौती
विभागों द्वारा एक ही काम के लिए दोहरी दरें
UPNL की वर्तमान व्यवस्था केवल एक भर्ती एजेंसी का रूप ले चुकी है, जो काम तो सरकारी कराती है लेकिन न वेतन की जिम्मेदारी लेती है, न भविष्य की सुरक्षा की। कई कर्मचारियों से यह भी आरोप सामने आए हैं कि हर महीने उनके वेतन से “एजेंसी चार्ज” के नाम पर कटौती की जाती है, लेकिन इसका कोई हिसाब किताब उन्हें नहीं मिलता। पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के जिस शासन की बात होती है, उसमें ऐसी व्यवस्थाएं प्रश्नचिन्ह बन जाती हैं।
समाधान क्या हो सकते हैं?
तत्काल समाधान:
एक उच्च स्तरीय समिति बनाकर 3 माह में विस्तृत रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन की घोषणा
विभागवार डेटा संकलन व सेवा पुस्तिकाओं की जांच
दीर्घकालिक समाधान:
UPNL नीति में संशोधन, जिससे सेवा शर्तें स्पष्ट हों
नियमितीकरण की पारदर्शी नीति, सेवा अवधि के आधार पर
संविदा कर्मचारी सेवा सुरक्षा कानून, जिसमें न्यूनतम लाभ अनिवार्य हों
दैनिक प्रभातवाणी की अपील
दैनिक प्रभातवाणी UPNL कर्मचारियों की इस अधूरी लड़ाई को पूरी संवेदना और गंभीरता से उठाता है। हम सरकार से यह मांग करते हैं कि:
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए तत्काल नीति घोषित की जाए
21,000 परिवारों के जीवन और भविष्य के साथ खिलवाड़ न हो
संविदा शब्द को ‘शोषण’ का पर्याय बनने से रोका जाए
आपकी राय ज़रूरी है!
क्या आप UPNL कर्मचारी हैं?
क्या आपके परिवार का कोई सदस्य इस संघर्ष से जूझ रहा है?
हमें लिखें:ajaysemalty98@gmail.com
WhatsApp करें: 6395084573
निष्कर्ष: न्याय में देरी, अन्याय के समान
आज यदि सरकार इस आदेश को लागू नहीं करती, तो यह न केवल अदालत की अवमानना है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर भी प्रहार है। यदि देश की सर्वोच्च न्यायपालिका के आदेश को नजरअंदाज किया जा सकता है, तो यह प्रशासनिक मनमानी की चरम सीमा है। ऐसे में आने वाले दिनों में यदि राज्य में एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा होता है, तो इसके लिए पूरी तरह से सरकार ही जिम्मेदार होगी। प्रशासन को यह समझना होगा कि ये कर्मचारी कोई पराये नहीं, बल्कि उसी राज्य की रीढ़ हैं। यदि इन्हें ही नज़रअंदाज़ किया गया, तो शासन व्यवस्था खोखली हो जाएगी।
लेखक: अजय सेमल्टी
प्रकाशक: www.dainikprbhatvani.com
तारीख: 23 जुलाई 2025