आपदा-प्रवण क्षेत्रों में निर्माण कार्य पर तत्काल रोक – मुख्यमंत्री धामी का बड़ा ऐलान
आपदा-प्रवण क्षेत्रों में निर्माण कार्य पर तत्काल रोक – मुख्यमंत्री धामी का बड़ा ऐलान
दैनिक प्रभातवाणी, देहरादून।
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में लगातार बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाओं ने सरकार को अब कड़े फैसले लेने पर मजबूर कर दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए कहा कि राज्य के सभी आपदा-प्रवण क्षेत्रों में अब किसी भी प्रकार का नया निर्माण कार्य नहीं किया जाएगा। यह प्रतिबंध अस्थायी नहीं, बल्कि तब तक लागू रहेगा जब तक विशेषज्ञ समिति द्वारा निर्धारित वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप निर्माण नीति तैयार नहीं हो जाती।
मुख्यमंत्री धामी ने यह फैसला राज्य आपदा प्रबंधन विभाग, भू-वैज्ञानिकों, मौसम विशेषज्ञों और जिला प्रशासन के संयुक्त सुझावों पर आधारित बताते हुए कहा कि हाल के वर्षों में आपदाओं की तीव्रता और प्रभाव बढ़ा है, जिससे जनहानि और आर्थिक नुकसान में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। विशेषकर मानसून के दौरान, राज्य के कई पहाड़ी इलाके पूरी तरह संवेदनशील हो जाते हैं, जहां थोड़ी सी बारिश के बाद ही भारी भूस्खलन, सड़क धंसने और नदी किनारे बाढ़ जैसी घटनाएं देखने को मिलती हैं।
प्राकृतिक आपदाओं की पृष्ठभूमि और बढ़ता खतरा
पिछले एक दशक में उत्तराखंड ने कई भीषण आपदाओं का सामना किया है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी से लेकर हाल के वर्षों में चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ जैसे जिलों में हुए भूस्खलन व ग्लेशियर टूटने की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अंधाधुंध निर्माण, प्राकृतिक जल निकासी मार्गों में अवरोध और बिना वैज्ञानिक अध्ययन के हो रहे विकास कार्य पहाड़ों के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर खतरे में डाल रहे हैं।
मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि कई मामलों में देखा गया है कि नदी किनारे बने होटल, रिसॉर्ट, मकान और सड़कें बाढ़ या मलबा बहाव की सीधी चपेट में आ जाते हैं। इसी प्रकार पहाड़ी ढलानों पर बिना मजबूत नींव और बिना भू-वैज्ञानिक अध्ययन के बनाए गए भवन और सड़कें भारी बारिश में धराशायी हो जाती हैं, जिससे न केवल संपत्ति का नुकसान होता है बल्कि स्थानीय लोगों और पर्यटकों की जान पर भी खतरा मंडराने लगता है।
केंद्र से तकनीकी और वित्तीय सहयोग की मांग
राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को इस फैसले की विस्तृत जानकारी देते हुए अनुरोध किया है कि आपदा-प्रवण क्षेत्रों के लिए दीर्घकालिक निर्माण नीति बनाने में तकनीकी सहयोग दिया जाए। मुख्यमंत्री धामी ने बताया कि इस संबंध में केंद्रीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) रुड़की, और वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी से विस्तृत रिपोर्ट मंगाई जाएगी। साथ ही, केंद्र से विशेष वित्तीय पैकेज की भी मांग की गई है ताकि सुरक्षित इलाकों में वैकल्पिक आवास और पुनर्वास परियोजनाएं चलाई जा सकें।
स्थानीय लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि
मुख्यमंत्री धामी ने स्पष्ट किया कि यह प्रतिबंध स्थानीय जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए लगाया गया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का पहला उद्देश्य लोगों की जान बचाना है, न कि ऐसे विकास कार्य करना जो भविष्य में उनके लिए जानलेवा साबित हों। उन्होंने आश्वासन दिया कि जिन परिवारों के घर आपदा-प्रवण क्षेत्रों में हैं, उन्हें सुरक्षित स्थानों पर बसाने के लिए विशेष पुनर्वास योजना बनाई जाएगी।
सरकार का यह भी कहना है कि प्रतिबंधित क्षेत्रों में मौजूदा निर्माणों की स्थिति का भी सर्वेक्षण किया जाएगा। अगर किसी भवन, सड़क या अन्य संरचना में दरारें या भू-स्खलन से संबंधित खतरे के संकेत मिलते हैं, तो वहां तुरंत मरम्मत या आवश्यकतानुसार ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाएगी।
पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर असर
यह निर्णय पर्यटन उद्योग के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि उत्तराखंड का एक बड़ा हिस्सा पर्यटन-आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। कई पर्यटन स्थल पहाड़ों के संवेदनशील क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां होटल और अन्य व्यावसायिक ढांचे बने हुए हैं। हालांकि, मुख्यमंत्री धामी का मानना है कि अल्पकालिक आर्थिक नुकसान से ज्यादा महत्वपूर्ण दीर्घकालिक सुरक्षा और सतत विकास है।
उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ‘सस्टेनेबल टूरिज्म’ को बढ़ावा देगी, जिसमें पर्यटकों की सुविधाएं तो उपलब्ध कराई जाएंगी, लेकिन प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नहीं होगी। इसके लिए पर्यावरण-अनुकूल निर्माण सामग्री, पारंपरिक वास्तुकला और स्थानीय कारीगरों की विशेषज्ञता का उपयोग किया जाएगा।
भविष्य की नीति और वैज्ञानिक निर्माण मानक
राज्य सरकार अब एक विस्तृत निर्माण कोड तैयार करने की दिशा में काम करेगी, जिसमें पहाड़ी ढलानों, नदी किनारों और ग्लेशियर प्रभावित क्षेत्रों में निर्माण से जुड़े सभी मानक स्पष्ट रूप से निर्धारित होंगे। इसमें नींव की गहराई, निर्माण सामग्री, जल निकासी व्यवस्था, भूस्खलन सुरक्षा उपाय, और भवनों के भार का आकलन जैसे बिंदु शामिल होंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि पहाड़ों पर होने वाले निर्माण कार्यों में स्थानीय जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों का ध्यान रखना आवश्यक है। अगर निर्माण नियमों में वैज्ञानिकता लाई जाए और उनका सख्ती से पालन किया जाए, तो न केवल आपदा के जोखिम को कम किया जा सकता है बल्कि पर्यावरण को भी संरक्षित रखा जा सकता है।
जनभागीदारी पर जोर
मुख्यमंत्री धामी ने यह भी कहा कि इस नीति को सफल बनाने में जनता की भागीदारी जरूरी है। स्थानीय लोगों, पंचायतों, गैर-सरकारी संगठनों और पर्यावरणविदों को इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। उन्होंने कहा कि कई बार सरकारें नियम तो बना देती हैं, लेकिन उनका पालन तभी होता है जब स्थानीय समाज भी उन्हें अपनाता है।
सरकार इस अभियान के लिए व्यापक जनजागरूकता कार्यक्रम शुरू करेगी, जिसमें लोगों को बताया जाएगा कि आपदा-प्रवण क्षेत्रों में निर्माण क्यों खतरनाक है और कैसे यह भविष्य में उनके लिए घातक साबित हो सकता है।
विशेष सर्वेक्षण और डिजिटल मैपिंग
राज्य सरकार ने सभी आपदा-प्रवण इलाकों की डिजिटल मैपिंग करने का भी निर्णय लिया है। इसमें सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन सर्वे और जीआईएस तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इस मैपिंग के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि कौन-कौन से क्षेत्र भूस्खलन, बाढ़ या ग्लेशियर टूटने के उच्च जोखिम वाले हैं। इस डेटा को सार्वजनिक किया जाएगा ताकि लोग अपने स्तर पर भी सतर्क रह सकें।
निष्कर्ष – सुरक्षा के लिए आवश्यक और दूरदर्शी कदम
उत्तराखंड सरकार का यह कदम निश्चित रूप से साहसिक और दूरदर्शी है। यह सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि पहाड़ों की नाजुक पारिस्थितिकी और स्थानीय जनता की सुरक्षा के प्रति गंभीर प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
मुख्यमंत्री धामी के अनुसार, विकास तभी सार्थक है जब वह मानव जीवन और प्रकृति की सुरक्षा के साथ आगे बढ़े। आने वाले समय में इस फैसले के परिणामस्वरूप राज्य में निर्माण गतिविधियों का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है। हो सकता है कि प्रारंभिक दौर में यह प्रतिबंध आर्थिक और बुनियादी ढांचे के विकास में बाधा के रूप में देखा जाए, लेकिन दीर्घकाल में यह पहाड़ों की रक्षा करने और उत्तराखंड को आपदा-रोधी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा।