उत्तराखंड केदारनाथ और हेमकुंड साहिब को जोड़ेगा रोपवे प्रोजेक्ट: आस्था, पर्यटन और अर्थव्यवस्था का संगम

दैनिक प्रभातवाणी, देहरादून | 2 सितम्बर 2025
उत्तराखंड की पर्वतों से घिरी वादियों में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। केदारनाथ और हेमकुंड साहिब जैसे विश्वप्रसिद्ध धार्मिक स्थलों तक पहुँचने का अनुभव अब पहले जैसा कठिन और समय लेने वाला नहीं रहेगा। राज्य सरकार ने केंद्र की पर्वतमाला योजना के तहत ₹7,000 करोड़ की दो विशाल रोपवे परियोजनाओं को मंज़ूरी देकर न केवल तीर्थयात्रियों बल्कि स्थानीय निवासियों और पर्यटन उद्योग के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य श्रद्धालुओं की यात्रा को सुरक्षित, तेज़ और सुविधाजनक बनाना है, साथ ही राज्य की अर्थव्यवस्था को नई उड़ान देना भी है।
कठिन यात्राओं में नया मोड़ – सोनप्रयाग से केदारनाथ तक रोपवे
केदारनाथ धाम हिंदू आस्था का प्रतीक माना जाता है। हर वर्ष लाखों यात्री यहाँ दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन कई बार मौसम की मार और दुर्गम रास्ते यात्रा को चुनौतीपूर्ण बना देते हैं। मौजूदा समय में सोनप्रयाग से केदारनाथ तक पहुँचने में पैदल या घोड़े-खच्चरों के सहारे कई घंटे लग जाते हैं। कई बार यात्रियों को ऊँचाई की वजह से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है।
अब 12.9 किलोमीटर लंबा सोनप्रयाग–केदारनाथ रोपवे, जिसकी अनुमानित लागत ₹4,100 करोड़ है, इस कठिनाई को काफी हद तक दूर कर देगा। यह रोपवे यात्रियों को मात्र कुछ ही मिनटों में मंदिर तक पहुँचा देगा। इतना ही नहीं, यह दुनिया की सबसे लंबी और ऊँचाई पर बनने वाली आधुनिक केबल कार परियोजनाओं में गिना जाएगा।
हेमकुंड साहिब के श्रद्धालुओं के लिए वरदान – गोविंदघाट से सीधा सफर
सिख आस्था के प्रमुख केंद्र हेमकुंड साहिब तक पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को अब तक 12–14 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करनी पड़ती थी, जो कई बुज़ुर्गों और बच्चों के लिए बेहद कठिन साबित होती थी। यात्रा के दौरान बारिश और बर्फबारी जैसी परिस्थितियाँ इस चुनौती को और बढ़ा देती थीं।
सरकार ने अब 12.4 किलोमीटर लंबा गोविंदघाट–हेमकुंड साहिब रोपवे, जिसकी लागत ₹2,700 करोड़ है, का एमओयू साइन किया है। इस रोपवे के बन जाने के बाद श्रद्धालु कुछ ही समय में सीधे गुरुद्वारे तक पहुँच सकेंगे। यह प्रोजेक्ट न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि उत्तराखंड में एडवेंचर और आध्यात्मिक पर्यटन का नया द्वार भी खोलेगा।
आर्थिक दृष्टि से बड़ा निवेश
उत्तराखंड पर्यटन पर निर्भर एक राज्य है। यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ, प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था हर साल लाखों पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। अनुमान है कि इन दोनों रोपवे परियोजनाओं से आने वाले वर्षों में राज्य की आर्थिक आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
हर वर्ष चारधाम यात्रा में शामिल होने वाले लाखों श्रद्धालु और पर्यटक अब और आसानी से इन स्थलों तक पहुँच पाएँगे।
पर्यटन से जुड़ी होटल, रेस्त्रां, परिवहन और लोकल व्यापार की आय कई गुना बढ़ेगी।
सरकार को टैक्स और सेवा शुल्क से प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, जिससे राज्य की वित्तीय स्थिति और मजबूत होगी।
स्थानीय युवाओं को मिलेगा रोज़गार
इन रोपवे परियोजनाओं से सबसे बड़ा लाभ स्थानीय युवाओं को होगा। निर्माण कार्य में हजारों मजदूर, इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञों की ज़रूरत पड़ेगी। इसके अलावा प्रोजेक्ट शुरू होने के बाद रखरखाव, सुरक्षा, प्रबंधन और सेवा क्षेत्र में स्थायी रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
ग्रामीण इलाकों के लोग, जो अब तक कृषि या छोटे व्यवसायों पर निर्भर थे, वे भी पर्यटन से जुड़ी सेवाओं जैसे गाइडिंग, होमस्टे, दुकानों और टूर पैकेज में अपनी भूमिका निभा पाएँगे।
आस्था और आध्यात्मिक पर्यटन को मिलेगा नया आयाम
केदारनाथ और हेमकुंड साहिब केवल धार्मिक स्थल ही नहीं बल्कि आस्था और आत्मिक शांति का प्रतीक हैं। जब श्रद्धालुओं को वहाँ तक पहुँचने में कम समय लगेगा, तो अधिक लोग यहाँ आकर धार्मिक वातावरण का अनुभव कर पाएँगे।
इससे आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। विदेशों से आने वाले तीर्थयात्री भी अब बेहतर सुविधाओं की वजह से आकर्षित होंगे। इससे उत्तराखंड न केवल देश बल्कि वैश्विक धार्मिक पर्यटन का केंद्र बन सकता है।
चुनौतियाँ और पर्यावरणीय चिंताएँ
इन महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के साथ कुछ चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं। उत्तराखंड की नाजुक पारिस्थितिकी और संवेदनशील पर्यावरण को देखते हुए बड़े निर्माण कार्य कई बार खतरे भी पैदा कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के प्रोजेक्ट्स को लागू करते समय सस्टेनेबल डेवलपमेंट पर विशेष ध्यान देना होगा।
जंगलों की कटाई और भू-भाग की खुदाई से पर्यावरण पर असर पड़ सकता है।
बड़े पैमाने पर आने वाले पर्यटक स्थानीय संसाधनों पर दबाव डालेंगे।
भूगर्भीय अस्थिरता और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं की संभावना भी बनी रहेगी।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सरकार और परियोजना संचालकों को पर्यावरण मित्र तकनीक, आधुनिक डिज़ाइन और सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता देनी होगी।
समयसीमा और लक्ष्य
सरकार ने इन दोनों रोपवे परियोजनाओं को वित्तीय वर्ष 2031–32 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है। यह समयसीमा लंबी ज़रूर लग सकती है, लेकिन इस तरह के विशाल निर्माण कार्यों के लिए यह एक व्यावहारिक योजना मानी जा रही है।
यदि यह कार्य निर्धारित समय पर पूरा होता है, तो अगले दशक तक उत्तराखंड केदारनाथ और हेमकुंड साहिब रोपवे के कारण विश्व पर्यटन मानचित्र पर एक नए रूप में उभर सकता है।
भविष्य की झलक – पर्यटन का नया चेहरा
इन रोपवे परियोजनाओं के पूरा होने के बाद उत्तराखंड का पर्यटन परिदृश्य पूरी तरह बदल जाएगा।
श्रद्धालुओं को अब पैदल चढ़ाई की कठिनाइयों से मुक्ति मिलेगी।
बुज़ुर्ग और दिव्यांग यात्री भी आसानी से यात्रा कर सकेंगे।
राज्य की अर्थव्यवस्था पर्यटन आधारित मॉडल की ओर और अधिक सुदृढ़ होगी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखंड को एक आधुनिक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में पहचान मिलेगी।
दैनिक प्रभातवाणी
उत्तराखंड सरकार का यह कदम केवल निर्माण कार्य नहीं बल्कि एक दूरदर्शी पहल है। केदारनाथ और हेमकुंड साहिब रोपवे प्रोजेक्ट्स से धार्मिक आस्था, पर्यटन, रोजगार और अर्थव्यवस्था – सभी को एक साथ लाभ मिलेगा। यह परियोजनाएँ पर्वतीय क्षेत्रों में विकास और आस्था के बीच संतुलन का उदाहरण बन सकती हैं।
हालांकि, यह भी सच है कि सफलता केवल उद्घाटन से नहीं बल्कि परियोजनाओं के सुरक्षित, समय पर और पर्यावरण-संतुलित क्रियान्वयन से तय होगी। यदि सब कुछ योजना के अनुसार हुआ, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड वास्तव में देवभूमि के साथ-साथ आधुनिक पर्यटन की भूमि के रूप में भी पहचाना जाएगा।