February 20, 2026

उत्तराखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: वन गुझ्जरों को बेदखली से राहत, अधिकारों के निपटारे तक नहीं हटाया जा सकेगा

उत्तराखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: वन गुझ्जरों को बेदखली से राहत, अधिकारों के निपटारे तक नहीं हटाया जा सकेगा

उत्तराखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: वन गुझ्जरों को बेदखली से राहत, अधिकारों के निपटारे तक नहीं हटाया जा सकेगा

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नैनीताल(दैनिक प्रभातवाणी ) 30 जनवरी 2026:  नैनीताल। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने वन गुझ्जर समुदाय के पक्ष में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला आदेश देते हुए स्पष्ट किया है कि जब तक वनाधिकार अधिनियम के तहत उनके दावों का अंतिम रूप से निपटारा नहीं हो जाता, तब तक उन्हें वनभूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता। अदालत के इस फैसले को राज्य के वनवासी और परंपरागत रूप से जंगलों पर निर्भर समुदायों के लिए न्याय की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वनाधिकार अधिनियम, 2006 का मूल उद्देश्य ही यह है कि सदियों से जंगलों में रह रहे और उन पर आश्रित समुदायों के अधिकारों की पहचान की जाए और उन्हें कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाए। ऐसे में जब तक किसी समुदाय के दावों पर विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत निर्णय नहीं हो जाता, तब तक उन्हें हटाने की कोई भी कार्रवाई कानून की भावना के विपरीत मानी जाएगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रशासनिक आदेश या विभागीय कार्रवाई के आधार पर किसी समुदाय को विस्थापित नहीं किया जा सकता।

यह मामला वन गुझ्जर समुदाय के कुछ सदस्यों द्वारा दायर याचिका के बाद न्यायालय के समक्ष आया था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे लंबे समय से वन क्षेत्रों में रहकर पशुपालन और सीमित कृषि के माध्यम से अपनी आजीविका चला रहे हैं, लेकिन वन विभाग द्वारा बार-बार उन्हें हटाने की कार्रवाई की जा रही है, जबकि उनके वनाधिकार दावे अभी भी लंबित हैं। याचिका में यह भी कहा गया था कि बिना दावों के निपटारे के की जा रही यह कार्रवाई न केवल असंवैधानिक है, बल्कि उनके जीवन और आजीविका के अधिकार का भी उल्लंघन है।

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने वनाधिकार अधिनियम की विभिन्न धाराओं का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया है। अदालत ने माना कि वन गुझ्जर समुदाय एक अर्ध-घुमंतू पशुपालक समुदाय है, जिसकी आजीविका जंगलों और चरागाहों से जुड़ी रही है। ऐसे में उन्हें अचानक हटाना सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने राज्य सरकार और वन विभाग को निर्देश दिए कि जब तक सभी वैध दावों का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक किसी भी प्रकार की बेदखली या जबरन हटाने की कार्रवाई न की जाए। साथ ही यह भी कहा गया कि समुदाय के लोग अपनी परंपरागत आजीविका, जैसे पशुपालन और सीमित कृषि गतिविधियां, जारी रख सकते हैं, बशर्ते वे कानून के दायरे में हों और किसी प्रकार की व्यावसायिक या गैर-कानूनी गतिविधि न की जाए।

इस आदेश के बाद वन गुझ्जर समुदाय में राहत की भावना देखी जा रही है। लंबे समय से विस्थापन के भय में जी रहे इन परिवारों के लिए यह फैसला एक कानूनी सुरक्षा कवच के रूप में सामने आया है। सामाजिक संगठनों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि यह फैसला न केवल वन गुझ्जरों, बल्कि देश भर के अन्य वनवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी एक मिसाल बनेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस आदेश से राज्य सरकार और प्रशासन पर यह जिम्मेदारी और बढ़ गई है कि वे वनाधिकार दावों के निपटारे की प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से पूरा करें। यदि दावों का निपटारा लंबे समय तक लंबित रहता है, तो इससे न केवल प्रशासनिक असंतोष बढ़ेगा, बल्कि सामाजिक तनाव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

उत्तराखंड हाई कोर्ट का यह फैसला एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि विकास और संरक्षण के नाम पर परंपरागत समुदायों के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती। कानून के तहत जब तक किसी के अधिकारों का निर्णय नहीं हो जाता, तब तक उन्हें उनके घर, जमीन और आजीविका से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है। यह आदेश आने वाले समय में वन नीति और प्रशासनिक फैसलों को भी प्रभावित कर सकता है और वनवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर एक नई दिशा तय कर सकता है।