धाराली में तबाही का सातवां दिन: सरकार ने पहली बार बताया, 43 लोग अब भी बेपता

धाराली में तबाही का सातवां दिन: सरकार ने पहली बार बताया, 43 लोग अब भी बेपता
उत्तरकाशी ज़िले के पहाड़ी गाँव धाराली में आई भयंकर प्राकृतिक आपदा को आज सात दिन बीत चुके हैं, लेकिन इस त्रासदी के जख्म अब भी ताज़ा हैं। पहाड़ की गोद में बसा यह इलाका बीते हफ्ते अचानक आए पानी और मलबे की मार से तबाह हो गया। तेज़ धार ने न केवल घरों और दुकानों को निगल लिया, बल्कि कई परिवारों की खुशियां भी बहा ले गई। अब राज्य सरकार ने पहली बार आधिकारिक तौर पर बताया है कि इस आपदा में 43 लोग अभी तक लापता हैं, जिनका कोई पता नहीं चल पाया है। राहत एवं बचाव कार्यों के बीच यह आंकड़ा सामने आने से लोगों के दिलों में चिंता और बढ़ गई है।
आपदा के बाद से ही सेना, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और आईटीबीपी की टीमें दिन-रात मोर्चा संभाले हुए हैं। पहाड़ की कठिन भौगोलिक स्थितियों, टूटी सड़कों और लगातार हो रही बारिश के कारण राहत अभियान कई बार रुक-रुक कर चल रहा है। मलबा हटाने में भारी मशीनों का सहारा लिया जा रहा है, लेकिन कई जगहों पर रास्ता इतना तंग है कि सिर्फ हाथों और छोटे औज़ारों से ही खुदाई करनी पड़ रही है।
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, लापता लोगों में स्थानीय ग्रामीण, बाहरी राज्यों के मजदूर और पर्यटक शामिल हैं। इनमें से कुछ लोग घटना के समय अपने घरों में सो रहे थे, तो कुछ बाजार या कामकाज के सिलसिले में बाहर थे। प्रशासन ने लापता व्यक्तियों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए डीएनए सैंपल लेने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है, ताकि मलबे से मिलने वाले शवों की पहचान में आसानी हो सके।
धराली में तबाही की जड़ें केवल एक रात की बारिश में नहीं, बल्कि कई वर्षों से पहाड़ के बदलते मौसम और लापरवाह विकास में छिपी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह हादसा अचानक आई बाढ़ या ग्लेशियर से जुड़े किसी विस्फोट (GLOF) का नतीजा हो सकता है। बीते कुछ सालों में इस इलाके में बारिश का पैटर्न बदल गया है, तापमान में वृद्धि और बर्फ पिघलने की रफ्तार भी तेज़ हुई है। इन सभी कारणों ने मिलकर धराली को एक आपदा के मुहाने पर ला खड़ा किया।
आपदा का असर केवल जान-माल के नुकसान तक सीमित नहीं है। इस गाँव की पहचान सेब के बागानों और पर्यटन से जुड़ी थी। लेकिन इस घटना में दर्जनों बागान पूरी तरह बर्बाद हो गए। कई हेक्टेयर ज़मीन पर मोटी परत में मलबा जम गया है, जिससे आने वाले कई वर्षों तक वहां खेती संभव नहीं होगी। पर्यटकों के आने-जाने पर भी रोक लगी हुई है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को और झटका लगा है।
आपदा की रात को बचे लोगों की कहानी सुनना किसी फिल्मी सीन से कम नहीं लगता। कई ग्रामीणों ने बताया कि उन्होंने अचानक एक तेज़ धमाके जैसी आवाज़ सुनी, और उसके बाद चारों तरफ से पानी, पत्थर और लकड़ी के मलबे का सैलाब आ गया। कुछ लोग किसी तरह छतों पर चढ़कर बच गए, तो कुछ ने पेड़ों और चट्टानों को पकड़कर अपनी जान बचाई। लेकिन जिनके प्रियजन बह गए, उनके लिए हर पल एक न खत्म होने वाला इंतजार बन चुका है।
राहत शिविरों में अब भी सैकड़ों लोग ठहरे हुए हैं। इन्हें अस्थायी तौर पर स्कूलों और पंचायत भवनों में रखा गया है। यहाँ खाने-पीने और दवाइयों की व्यवस्था की गई है, लेकिन ठंड और बरसात के मौसम में इन शिविरों में रहना आसान नहीं है। बच्चे अपने स्कूल से दूर हैं, बुज़ुर्ग अपने घरों की चिंता में परेशान हैं, और महिलाएं आने वाले कल के बारे में सोचकर सिहर उठती हैं।
प्रशासन ने प्रभावित परिवारों को पाँच लाख रुपये की तत्काल आर्थिक मदद देने की घोषणा की है। साथ ही, जिनका घर पूरी तरह बह गया या टूट गया है, उन्हें पुनर्वास पैकेज देने की योजना पर काम हो रहा है। लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि पैसा तो फिर से आ सकता है, मगर जो लोग और जो यादें खो गईं, उन्हें कभी वापस नहीं पाया जा सकता।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अभी खतरा टला नहीं है। मौसम विभाग ने अगले कुछ दिनों के लिए उत्तरकाशी समेत आसपास के इलाकों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। अगर बारिश तेज़ हुई तो भूस्खलन और दूसरी घटनाएं राहत कार्य को और मुश्किल बना देंगी।
धाराली की इस त्रासदी ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया है कि क्या हम पहाड़ों में विकास के नाम पर जो निर्माण कर रहे हैं, वह सुरक्षित है? नदी किनारों और ढलानों पर होटल, सड़कें और मकान बनाने से पहले क्या पर्याप्त भूवैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है? क्या जलवायु परिवर्तन के खतरे को लेकर हमारी तैयारी पर्याप्त है?
इस आपदा ने केवल पहाड़ के लोगों को ही नहीं, बल्कि पूरे देश को झकझोर दिया है। 43 लापता लोग आज केवल एक संख्या नहीं, बल्कि 43 परिवारों की टूटी उम्मीदों और अनकहे दर्द की कहानी हैं। हर दिन जब बचावकर्मी मलबा हटाते हैं, तो गांव वालों की नजरें उम्मीद से उनकी ओर टिकी होती हैं कि शायद कोई चमत्कार हो और उनका अपना किसी तरह जिंदा मिल जाए।
धराली का यह हादसा एक चेतावनी है—कि हिमालय जितना खूबसूरत है, उतना ही नाज़ुक भी है। यहाँ एक छोटी सी चूक भी बड़ी त्रासदी का कारण बन सकती है। अब समय आ गया है कि हम पहाड़ की सीमाओं को समझें, प्राकृतिक संतुलन के साथ समझौता न करें और विकास के हर कदम को सोच-समझकर उठाएं।
फिलहाल, धराली में बचाव कार्य जारी है, लेकिन हर गुजरते दिन के साथ लापता लोगों को जीवित पाने की संभावना कम होती जा रही है। गांव के लोग अब सिर्फ एक चीज़ चाहते हैं—अपने अपनों का अंतिम दर्शन, ताकि वे उन्हें सम्मानपूर्वक विदा कर सकें और अपने जीवन की नई शुरुआत करने का साहस जुटा सकें।