January 11, 2026

नैनीताल तक कफ सिरप विवाद और छापेमारी : बच्चों की सुरक्षा पर सख्त हुई सरकार

नैनीताल तक कफ सिरप विवाद और छापेमारी : बच्चों की सुरक्षा पर सख्त हुई सरकार
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नैनीताल, 6 अक्टूबर 2025/दैनिक प्रभातवाणी 

उत्तराखंड इन दिनों एक गंभीर विवाद का सामना कर रहा है। राज्यभर में संदिग्ध और प्रतिबंधित कफ सिरप की बिक्री की आशंका ने स्वास्थ्य विभाग और खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) को अलर्ट कर दिया है। नैनीताल जैसे पर्यटन और शैक्षणिक दृष्टि से महत्वपूर्ण शहर तक यह विवाद पहुँच गया है। छापेमारी अभियान के साथ-साथ सरकार ने यह साफ कर दिया है कि बच्चों की सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के सख्त निर्देश के बाद मेडिकल स्टोर्स और दवा कंपनियों पर कड़ी नजर रखी जा रही है।


विवाद की शुरुआत और पृष्ठभूमि

कफ सिरप विवाद सिर्फ उत्तराखंड का नहीं बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय दवा उद्योग पर कई बार गंभीर सवाल उठे हैं। बच्चों को दिए जाने वाले कफ सिरप में संदिग्ध रसायनों की मिलावट, गुणवत्ता नियंत्रण में ढिलाई और निर्यात में पारदर्शिता की कमी ने भारत की छवि को नुकसान पहुँचाया है।

गाम्बिया में भारत निर्मित कफ सिरप से बच्चों की मौत की खबर ने पूरी दुनिया को हिला दिया था। उज्बेकिस्तान में भी ऐसा ही मामला सामने आया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सीधे भारत में बनी दवाओं की गुणवत्ता पर सवाल उठाए। इन घटनाओं के बाद भारत सरकार को भी अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना पड़ा।

उत्तराखंड में जब संदिग्ध कफ सिरप मिलने की शिकायतें आईं तो यह माना गया कि समस्या सिर्फ बड़े शहरों या निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे राज्यों और स्थानीय बाजारों में भी फैल चुकी है।


नैनीताल में छापेमारी और कार्रवाई

नैनीताल शहर और उसके आसपास के क्षेत्रों में FDA की टीमों ने अचानक छापेमारी शुरू की। यह छापेमारी बिना किसी पूर्व सूचना के की गई ताकि मेडिकल स्टोर्स को तैयारी का मौका न मिल सके। जांच के दौरान कई दवाओं के बैच नंबर संदिग्ध पाए गए। इन्हें तुरंत सील कर दिया गया और नमूने जांच के लिए लैब भेज दिए गए।

सूत्रों के अनुसार, कुछ दुकानों में ऐसे सिरप भी पाए गए जिन पर पहले से ही प्रतिबंध लगा हुआ था। यह एक गंभीर अपराध माना जा रहा है। FDA अधिकारियों का कहना है कि रिपोर्ट आने के बाद दोषी पाए गए मेडिकल स्टोर संचालकों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसमें लाइसेंस रद्द करने से लेकर एफआईआर दर्ज करने तक की कार्रवाई शामिल हो सकती है।


मुख्यमंत्री धामी का सख्त रुख

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। उन्होंने अधिकारियों को साफ आदेश दिया है कि बच्चों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार इस मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाएगी।

धामी ने जनता को भरोसा दिलाया कि दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार केंद्र सरकार और WHO के दिशा-निर्देशों के अनुरूप ही दवाओं की गुणवत्ता की जांच कर रही है।


जनता में चिंता और डर

कफ सिरप विवाद ने आम जनता में गहरी चिंता पैदा कर दी है। अभिभावक सबसे ज्यादा डरे हुए हैं। नैनीताल और हल्द्वानी जैसे शहरों में लोग डॉक्टरों से बार-बार यह पूछ रहे हैं कि कौन सा सिरप सुरक्षित है। कई माता-पिता ने अपने बच्चों को बिना डॉक्टर की सलाह के सिरप देना बंद कर दिया है।

अस्पतालों में भी इस विवाद का असर दिखाई दे रहा है। डॉक्टरों के पास दवा सुरक्षा से जुड़े सवालों की बाढ़ आ गई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह डर जायज है क्योंकि बच्चे पहले से ही कमजोर प्रतिरोधक क्षमता रखते हैं और उनके शरीर पर खराब दवाओं का असर बहुत जल्दी पड़ता है।


डॉक्टरों और विशेषज्ञों की राय

डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाओं में गुणवत्ता का उच्चतम स्तर होना चाहिए। घटिया दवा सीधे बच्चों की किडनी, लिवर और ब्रेन पर असर डाल सकती है। कुछ डॉक्टरों का कहना है कि छोटे बच्चों की मौतें कई बार गलत दवा या संदिग्ध सिरप के कारण भी होती हैं, लेकिन इन्हें समय पर रिपोर्ट नहीं किया जाता।

फार्मासिस्ट एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि केवल पंजीकृत और अधिकृत कंपनियों की दवाओं को ही मेडिकल स्टोर्स तक पहुंचने दिया जाए। साथ ही हर बैच की जांच अनिवार्य की जानी चाहिए।


अंतरराष्ट्रीय विवाद की गूंज

भारत में बनी दवाओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय विवाद ने भी देश की छवि को धक्का पहुंचाया है। गाम्बिया में 70 से अधिक बच्चों की मौत के बाद WHO ने सीधे भारत को जिम्मेदार ठहराया था। इसी तरह उज्बेकिस्तान में भी बच्चों की मौत का मामला सामने आया।

इन घटनाओं के बाद भारतीय दवा कंपनियों की जांच शुरू हुई। हालांकि भारत सरकार ने कहा कि दवा निर्यात करने वाली कंपनियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी, लेकिन वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिष्ठा को नुकसान हुआ। अब जब नैनीताल जैसे छोटे शहर में संदिग्ध सिरप मिल रहा है, तो यह विवाद और गहराता जा रहा है।


दवा उद्योग की खामियाँ

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में दवा उद्योग दुनिया का सबसे बड़ा जनरेरिक औषधि उत्पादक है, लेकिन गुणवत्ता नियंत्रण पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना आवश्यक है। कई छोटी कंपनियाँ सिर्फ मुनाफे के लिए दवाओं का उत्पादन करती हैं और गुणवत्ता की अनदेखी करती हैं।

दवा की टेस्टिंग प्रक्रिया में भी कई खामियाँ सामने आती हैं। हर बैच की जांच के लिए पर्याप्त लैब नहीं हैं। दूसरी ओर, सप्लाई चेन में पारदर्शिता की कमी के कारण नकली और घटिया दवाएँ भी बाजार तक पहुंच जाती हैं।


भविष्य की चुनौतियाँ और समाधान

उत्तराखंड में हुई छापेमारी सिर्फ शुरुआत है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह समस्या तब तक खत्म नहीं होगी जब तक सरकार दीर्घकालिक नीति नहीं बनाती। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे—

  • हर दवा कंपनी को नियमित ऑडिट से गुजरना होगा।

  • दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सभी रसायनों की टेस्टिंग अनिवार्य हो।

  • मेडिकल स्टोर्स को केवल अधिकृत सप्लायर से ही दवाएँ खरीदनी हों।

  • जनता को जागरूक करने के लिए हेल्पलाइन और जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।

  • दोषियों को कड़ी सजा देकर उदाहरण प्रस्तुत किया जाए।


अभिभावकों की भूमिका

बच्चों की सुरक्षा में अभिभावकों की भूमिका भी अहम है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बच्चों को कभी भी बिना डॉक्टर की सलाह के सिरप न दिया जाए। दवा की बोतल पर बैच नंबर और एक्सपायरी डेट जरूर देखें। अगर कोई दवा संदिग्ध लगे तो तुरंत FDA या हेल्पलाइन पर सूचना दें।


नैनीताल की खास स्थिति

नैनीताल जैसे शहर में जहां हजारों पर्यटक और छात्र आते-जाते हैं, वहां दवाओं की सुरक्षा और भी जरूरी हो जाती है। यहां मेडिकल स्टोर्स की बड़ी संख्या है और उनका नियंत्रण चुनौतीपूर्ण है। FDA अधिकारियों का कहना है कि नैनीताल और आसपास के क्षेत्रों को विशेष निगरानी में रखा जाएगा।


दैनिक प्रभातवाणी

कफ सिरप विवाद ने उत्तराखंड को हिला दिया है। नैनीताल तक फैले इस विवाद ने यह साबित कर दिया है कि बच्चों की दवा सुरक्षा एक गंभीर मुद्दा है। मुख्यमंत्री धामी के सख्त निर्देश और FDA की कार्रवाई ने जनता में भरोसा जगाया है, लेकिन यह समस्या तब तक पूरी तरह खत्म नहीं होगी जब तक दवा उद्योग में पारदर्शिता और कठोर निगरानी नहीं लाई जाती।

बच्चों की जान किसी भी कीमत पर जोखिम में नहीं डाली जा सकती। अब समय आ गया है कि सरकार, दवा कंपनियाँ, मेडिकल स्टोर्स और अभिभावक— सभी मिलकर यह सुनिश्चित करें कि हर बच्चे तक केवल सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण दवा पहुँचे। यही असली स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी होगी।