January 11, 2026

भारत में एआई बजट की कमी: 2030 तक 2.3 मिलियन नौकरियों और $1.5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के अवसर पर संकट

भारत में एआई बजट की कमी: 2030 तक 2.3 मिलियन नौकरियों और $1.5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के अवसर पर संकट
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दैनिक प्रभातवाणी
भारत में एआई बजट की कमी: 2030 तक 2.3 मिलियन नौकरियों और $1.5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के अवसर पर संकट

नई दिल्ली। (विशेष संवाददाता)
भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) के क्षेत्र में बढ़ते वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच यह चिंता लगातार बढ़ रही है कि देश का मौजूदा बजट और निवेश इस दिशा में पर्याप्त नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी और नवाचार फाउंडेशन (Information Technology and Innovation Foundation – ITIF) के वाइस प्रेसिडेंट स्टीफन एजेल (Stephen Ezell) का कहना है कि भारत को अपनी महत्वाकांक्षी एआई योजनाओं को साकार करने के लिए डेटा एक्सेसिबिलिटी को बढ़ाना होगा और निवेशों में तेजी लानी होगी। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में देश न केवल आर्थिक लाभ से वंचित रह सकता है, बल्कि करोड़ों युवाओं के लिए संभावित रोजगार अवसर भी खतरे में पड़ सकते हैं।

एआई के बढ़ते महत्व पर विशेषज्ञों की चेतावनी

एजेल के अनुसार, अगर भारत ने इस समय एआई के क्षेत्र में आवश्यक वित्तीय और तकनीकी निवेश नहीं किया, तो 2030 तक अनुमानित 2.3 मिलियन (23 लाख) रोजगार अवसर और 1.2 से 1.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का आर्थिक योगदान खो सकता है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर अमेरिका, चीन और यूरोप इस तकनीक में आक्रामक रूप से निवेश कर रहे हैं, जबकि भारत अभी शुरुआती चरण में ही है। एआई केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, उद्योग, रक्षा और प्रशासन जैसे लगभग हर क्षेत्र को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखता है।

वर्तमान निवेश और उसकी सीमाएँ

भारत सरकार ने हाल के वर्षों में एआई पर कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिनमें ‘राष्ट्रीय कृत्रिम बुद्धिमत्ता रणनीति’ और विभिन्न सेक्टर-विशिष्ट एआई प्रोजेक्ट शामिल हैं। हालांकि, इन योजनाओं को लेकर एक आम धारणा है कि इनका बजट वैश्विक मानकों के हिसाब से बेहद सीमित है। उदाहरण के तौर पर, चीन ने एआई रिसर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर में अरबों डॉलर झोंक दिए हैं, जबकि भारत का सरकारी खर्च कुछ हजार करोड़ रुपये से आगे नहीं बढ़ पाया है। निजी क्षेत्र में भी एआई स्टार्टअप्स के पास संसाधनों की कमी है, जिसके कारण वे बड़े पैमाने पर रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) करने में असमर्थ हैं।

डेटा एक्सेसिबिलिटी की बड़ी चुनौती

एआई के विकास के लिए डेटा सबसे महत्वपूर्ण ईंधन है, लेकिन भारत में अभी भी डेटा की उपलब्धता और गुणवत्ता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। अधिकांश सरकारी और निजी संस्थानों का डेटा या तो डिजिटल रूप में उपलब्ध नहीं है या फिर उसे साझा करने के लिए स्पष्ट नीतियाँ नहीं हैं। इससे स्टार्टअप्स और शोध संस्थानों को नवीनतम और सटीक जानकारी तक पहुंचने में कठिनाई होती है। एजेल का कहना है कि यदि भारत एआई में प्रतिस्पर्धी बनना चाहता है, तो उसे ओपन डेटा पॉलिसी, डेटा शेयरिंग प्लेटफॉर्म और मजबूत डेटा प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क विकसित करने होंगे।

रोजगार और आर्थिक अवसर

एआई न केवल उत्पादनशीलता को बढ़ा सकता है बल्कि नए रोजगार भी पैदा कर सकता है। उदाहरण के तौर पर, हेल्थकेयर में एआई-आधारित डायग्नोस्टिक टूल्स, कृषि में स्मार्ट फार्मिंग टेक्नोलॉजी, और मैन्युफैक्चरिंग में ऑटोमेशन जैसी पहलें लाखों लोगों के लिए नई नौकरियां पैदा कर सकती हैं। एक अनुमान के अनुसार, सही नीतियों और निवेश के साथ भारत 2030 तक अपनी GDP में 10–15% तक की अतिरिक्त वृद्धि दर्ज कर सकता है। हालांकि, यह तभी संभव होगा जब एआई को स्किल डेवलपमेंट, इनोवेशन और इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ा जाए।

अन्य देशों से तुलना
  • अमेरिका: एआई में भारी-भरकम निवेश, उन्नत शोध सुविधाएं, और विश्व स्तरीय यूनिवर्सिटी–इंडस्ट्री साझेदारी।

  • चीन: सरकारी प्रोत्साहन के साथ एआई को राष्ट्रीय प्राथमिकता घोषित किया गया, अरबों डॉलर के निवेश और पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप।

  • यूरोप: एथिकल एआई फ्रेमवर्क, डेटा प्रोटेक्शन, और रिसर्च में निरंतर निवेश।

  • भारत: शुरुआती कदम उठाए गए हैं, लेकिन अभी भी संसाधनों, विशेषज्ञता और निवेश में भारी कमी।

शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट का महत्व

भारत की जनसंख्या में युवाओं का बड़ा हिस्सा है, लेकिन एआई के लिए आवश्यक हाई-एंड स्किल्स बहुत सीमित हैं। अधिकांश इंजीनियरिंग और तकनीकी कॉलेजों में एआई, मशीन लर्निंग, और डेटा साइंस को लेकर प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की कमी है। अगर शिक्षा संस्थानों में इंडस्ट्री-लिंक्ड सिलेबस और प्रोजेक्ट-बेस्ड लर्निंग को शामिल नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में स्किल गैप और भी बढ़ जाएगा।

निजी क्षेत्र की भूमिका

निजी क्षेत्र एआई के तेजी से विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, लेकिन इसके लिए सरकारी नीतियों में स्थिरता और निवेश आकर्षित करने वाला माहौल जरूरी है। भारतीय आईटी कंपनियां जैसे इंफोसिस, टीसीएस और विप्रो ने एआई पर काम शुरू किया है, लेकिन उनके प्रोजेक्ट्स अक्सर क्लाइंट-ड्रिवन होते हैं और घरेलू उपयोग के लिए अपेक्षाकृत कम होते हैं।

भविष्य की रणनीतियाँ – विशेषज्ञों की सिफारिशें
  1. सरकारी निवेश में वृद्धि – एआई बजट को वैश्विक औसत के बराबर लाना।

  2. ओपन डेटा इकोसिस्टम – सुरक्षित लेकिन सुलभ डेटा शेयरिंग फ्रेमवर्क बनाना।

  3. शोध और नवाचार केंद्र – देशभर में AI सेंटर ऑफ एक्सीलेंस की स्थापना।

  4. एथिकल और रेगुलेटरी फ्रेमवर्क – तकनीक के दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून।

  5. वैश्विक सहयोग – अन्य देशों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ साझेदारी।

दैनिक प्रभातवाणी

भारत एआई क्रांति के मुहाने पर खड़ा है। यह समय है जब देश को यह तय करना होगा कि वह इस तकनीकी बदलाव का नेतृत्व करेगा या फिर केवल इसका उपभोक्ता बनेगा। अपर्याप्त बजट, सीमित डेटा एक्सेसिबिलिटी और स्किल गैप जैसी चुनौतियों को दूर किए बिना यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल होगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि आज निर्णायक कदम उठाए जाएं, तो 2030 तक भारत न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकता है, बल्कि वैश्विक एआई इकोसिस्टम में अग्रणी स्थान भी हासिल कर सकता है।