February 20, 2026

दिल्ली हाई कोर्ट का अहम फैसला: किशोरों के आपसी सहमति वाले रिश्तों को अपराध नहीं माना जा सकता

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दिल्ली हाई कोर्ट का अहम फैसला: किशोरों के आपसी सहमति वाले रिश्तों को अपराध नहीं माना जा सकता
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नई दिल्ली | 11 फ़रवरी 2026 | दैनिक प्रभातवाणी

दिल्ली हाई कोर्ट ने किशोरों के व्यक्तिगत अधिकारों और सामाजिक संवेदनशीलता को लेकर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किशोर अवस्था में रहने वाले बच्चों के बीच यदि आपसी सहमति से प्रेम संबंध स्थापित होते हैं, तो केवल इसी आधार पर उन्हें आपराधिक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि किसी प्रकार के शोषण, दबाव, हिंसा या दुर्व्यवहार का ठोस और स्पष्ट प्रमाण सामने न आए।

हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि किशोरावस्था जीवन का वह चरण है, जहां भावनात्मक समझ विकसित होती है और बच्चे धीरे-धीरे अपने फैसले स्वयं लेने की क्षमता प्राप्त करते हैं। ऐसे में हर प्रेम संबंध को कानून की सख्त नजर से देखना न केवल बच्चों के मानसिक विकास के लिए नुकसानदायक हो सकता है, बल्कि यह उनके मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन है। अदालत ने यह भी माना कि सामाजिक दबाव या पारिवारिक असहमति के चलते कई बार ऐसे मामलों में कानून का दुरुपयोग किया जाता है।

अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि संरक्षण के नाम पर बच्चों की भावनाओं और उनकी सहमति की अनदेखी नहीं की जा सकती। यदि किसी मामले में यह साबित होता है कि संबंध पूरी तरह से स्वैच्छिक है और उसमें किसी प्रकार की जबरदस्ती, धोखा या शोषण शामिल नहीं है, तो ऐसे मामलों को आपराधिक दृष्टि से देखना न्यायसंगत नहीं होगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा है, न कि उनके प्राकृतिक भावनात्मक विकास को अपराध की श्रेणी में डालना।

दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले को बाल अधिकारों और किशोर न्याय व्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय निचली अदालतों और जांच एजेंसियों को दिशा देगा, जिससे वे ऐसे मामलों में अधिक संवेदनशील और संतुलित दृष्टिकोण अपना सकें। साथ ही, यह फैसला समाज को भी यह संदेश देता है कि किशोरों के रिश्तों को समझदारी और संवेदनशीलता के साथ देखने की जरूरत है, न कि केवल दंडात्मक नजरिए से।

इस फैसले के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि भविष्य में किशोरों से जुड़े प्रेम संबंधों के मामलों में कानून का प्रयोग सोच-समझकर किया जाएगा और बच्चों के अधिकारों, उनकी गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाएगी।

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