बुरांश का समय से पहले खिलना बना पर्यावरणीय चेतावनी, जलवायु परिवर्तन की ओर इशारा

उत्तराखंड के ऊँचे पर्वतीय इलाकों में बुरांश के फूल इस वर्ष जनवरी में ही खिलने लगे हैं, जबकि सामान्यतः यह फरवरी–मार्च में खिलते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह असामान्य फूलना जलवायु परिवर्तन और तापमान असंतुलन का संकेत है। पर्यावरणविदों का मानना है कि इससे स्थानीय पारिस्थितिकी और जैव विविधता पर असर पड़ सकता है।
देहरादून | दैनिक प्रभातवाणी | 19 जनवरी 2026
उत्तराखंड के ऊँचे पर्वतीय इलाकों में इस वर्ष बुरांश (रhododendron) का समय से पहले खिलना पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों के लिए चिंता का संकेत बन गया है। आमतौर पर फरवरी–मार्च में खिलने वाला बुरांश अब जनवरी महीने में ही पहाड़ों को लाल रंग से ढकने लगा है, जिसे विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत मान रहे हैं।
गढ़वाल और कुमाऊँ के कई ऊँचाई वाले क्षेत्रों में बुरांश के फूल असामान्य रूप से जल्दी दिखाई देने लगे हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पहले कभी जनवरी में इस तरह बुरांश को खिलते नहीं देखा। बुजुर्गों के अनुसार बुरांश का समय पर खिलना मौसम के संतुलन से जुड़ा होता है, लेकिन इस बार मौसम चक्र पूरी तरह बिगड़ा हुआ नजर आ रहा है।
पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक सर्दियों में अपेक्षित ठंड न पड़ना, तापमान में लगातार बढ़ोतरी और बर्फबारी का कम होना इस बदलाव की प्रमुख वजह हो सकती है। उनका कहना है कि पौधों का जीवन चक्र तापमान और मौसम पर निर्भर करता है, और जब मौसम असामान्य होता है तो फूलों और फसलों के समय में भी बदलाव देखने को मिलता है। बुरांश जैसे संवेदनशील पौधे जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक संकेतक माने जाते हैं।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि बुरांश का समय से पहले खिलना केवल एक फूल का असामान्य व्यवहार नहीं है, बल्कि यह आने वाले समय में पानी की कमी, जैव विविधता पर असर और पारंपरिक कृषि चक्र के प्रभावित होने की ओर भी इशारा करता है। इससे मधुमक्खियों, पक्षियों और अन्य जीवों की जीवन-प्रणाली पर भी असर पड़ सकता है, जो बुरांश के फूलों पर निर्भर रहते हैं।
पर्यावरणविदों का मानना है कि यदि तापमान वृद्धि और मौसम में यह असंतुलन जारी रहा, तो भविष्य में हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी बढ़ सकता है। उन्होंने सरकार और समाज दोनों से पर्यावरण संरक्षण, वनों की रक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रति जागरूकता बढ़ाने की अपील की है।
जनवरी में खिला बुरांश उत्तराखंड की सुंदरता तो बढ़ा रहा है, लेकिन इसके पीछे छिपा संदेश गंभीर और चिंताजनक है। यह प्रकृति की ओर से एक चेतावनी है कि यदि समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो इसके दूरगामी परिणाम पूरे हिमालयी क्षेत्र को प्रभावित कर सकते हैं।