Spread the love देहरादून। उत्तराखंड की धरती से निकलकर अब हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे वैज्ञानिक शोध की गूंज संयुक्त राष्ट्र तक पहुँच चुकी है। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं भौतिकी विभाग के प्रोफेसर डॉ. आर.सी. रमोला के नेतृत्व में किए गए शोध कार्य को संयुक्त राष्ट्र वैज्ञानिक समिति ऑन द इफेक्ट्स ऑफ एटॉमिक रेडिएशन (UNSCEAR) की प्रतिष्ठित वैश्विक रिपोर्ट में शामिल किया गया है। यह उपलब्धि केवल एक वैज्ञानिक सम्मान नहीं बल्कि भारतीय विज्ञान, उत्तराखंड के शोध संस्थानों और हिमालयी क्षेत्रों में हो रहे अनुसंधान की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति मानी जा रही है। करीब चार दशकों से रेडिएशन, राडॉन, थोरॉन और प्राकृतिक विकिरण पर लगातार शोध कर रहे प्रो. रमोला आज भारत के उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं जिनके कार्य को विश्व वैज्ञानिक समुदाय गंभीरता से देखता है। उनका शोध विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक विकिरण के स्तर, पर्यावरणीय प्रभाव और मानव स्वास्थ्य पर उसके असर को समझने पर केंद्रित रहा है। गढ़वाल हिमालय जैसे भूकंपीय और भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में रेडिएशन से जुड़े जोखिमों को समझना वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से चुनौती बना हुआ है और इसी क्षेत्र में प्रो. रमोला की टीम लगातार कार्य कर रही है। विश्वविद्यालय की न्यूक्लियर रिसर्च लेबोरेटरी ने पिछले वर्षों में कई महत्वपूर्ण शोध किए हैं, जिनमें हिमालयी क्षेत्रों के भूजल में यूरेनियम की मात्रा, घरों के भीतर राडॉन गैस का स्तर, मिट्टी में प्राकृतिक रेडियोधर्मिता तथा विकिरण से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों का अध्ययन शामिल है। इन शोधों को अब संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में स्थान मिलना इस बात का संकेत है कि उत्तराखंड में हो रहा वैज्ञानिक कार्य अब वैश्विक नीति निर्माण और रेडिएशन सुरक्षा मानकों में भी उपयोगी माना जा रहा है। UNSCEAR दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक संस्थाओं में मानी जाती है, जो आयनकारी विकिरण के मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रभावों का अध्ययन करती है। इसकी रिपोर्टों का उपयोग दुनियाभर की सरकारें, स्वास्थ्य एजेंसियाँ और परमाणु सुरक्षा संस्थान करते हैं। किसी भारतीय विश्वविद्यालय के शोध कार्य का इसमें शामिल होना अत्यंत प्रतिष्ठित उपलब्धि माना जाता है, क्योंकि आमतौर पर ऐसी रिपोर्टों में अमेरिका, यूरोप और जापान जैसे देशों के शोध अधिक प्रमुखता से शामिल होते हैं। प्रो. आर.सी. रमोला का वैज्ञानिक सफर भी बेहद प्रेरणादायक रहा है। वे लगभग 39 वर्षों से शोध कार्य से जुड़े हुए हैं और पर्यावरणीय रेडिएशन संरक्षण, न्यूक्लियर फिजिक्स तथा आयन-बीम इंटरैक्शन जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखते हैं। उनका नाम Stanford University की “World Top 2% Scientists” सूची में भी शामिल रह चुका है। इसके अलावा उन्हें विज्ञान एवं उच्च शिक्षा में योगदान के लिए कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन और वैज्ञानिक समुदाय ने इस उपलब्धि को उत्तराखंड के लिए गौरव का क्षण बताया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक रेडिएशन पर हो रहा यह शोध भविष्य में पर्यावरण सुरक्षा, स्वास्थ्य नीति, परमाणु सुरक्षा तथा आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। साथ ही इससे भारत के वैज्ञानिक संस्थानों की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता भी मजबूत होगी। प्रो. रमोला ने अपनी इस सफलता का श्रेय अपनी पूरी रिसर्च टीम, विश्वविद्यालय और युवा शोधार्थियों को दिया। उनका कहना है कि भारत, विशेषकर हिमालयी क्षेत्रों से जुड़े शोधों को लंबे समय तक वैश्विक मंचों पर सीमित प्रतिनिधित्व मिलता रहा, लेकिन अब भारतीय वैज्ञानिकों का योगदान विश्व स्तर पर तेजी से पहचाना जा रहा है। Post Views: 4 Post navigation गंगोत्री हाईवे पर घायल युवक की पुलिस और आईटीबीपी जवानों ने बचाई जान, पेश की मानवता की मिसाल संयुक्त राष्ट्र की प्रतिष्ठित रिपोर्ट में शामिल हुआ डॉ. मुकेश प्रसाद बिजल्वाण का शोध, उत्तराखंड को मिली वैश्विक पहचान