नंदा देवी राजजात यात्रा 2026 स्थगित, अब 2027 में होगा ‘हिमालय का महाकुंभ’
ajaysemalty98 January 18, 2026
हिमालय का महाकुंभ कही जाने वाली नंदा देवी राजजात यात्रा 2026 स्थगित, अब 2027 में होगा भव्य आयोजन अगर चाहें तो मैं इसे Rank Math SEO, WordPress मीडिया लाइब्रेरी या Google Discover-Friendly फॉर्मेट में भी अलग-अलग बना दूँ।
चमोली, उत्तराखंड | 18 जनवरी 2026
उत्तराखंड की आस्था, परंपरा और हिमालयी संस्कृति का प्रतीक मानी जाने वाली विश्वप्रसिद्ध नंदा देवी राजजात यात्रा को लेकर बड़ा निर्णय सामने आया है। वर्ष 2026 में प्रस्तावित इस ऐतिहासिक और अत्यंत कठिन पैदल धार्मिक यात्रा को स्थगित कर दिया गया है। अब यह यात्रा साल 2027 में आयोजित किए जाने की संभावना है। इस निर्णय की जानकारी नंदा देवी राजजात यात्रा समिति से जुड़े पदाधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से दी है। हिमालय की गोद में होने वाली इस यात्रा को श्रद्धालु प्रेम से ‘हिमालय का महाकुंभ’ कहते हैं, जो हर 12 वर्ष में एक बार आयोजित होती है और जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।
कर्णप्रयाग में आयोजित बैठक के बाद राजजात समिति के अध्यक्ष राकेश कुंवर और समिति से जुड़े वरिष्ठ सदस्य भुवन नौटियाल ने यात्रा स्थगित किए जाने की औपचारिक घोषणा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्ष 2026 में राजजात यात्रा का आयोजन संभव नहीं है, इसलिए सर्वसम्मति से इसे अगले वर्ष 2027 तक के लिए टालने का निर्णय लिया गया है। समिति ने यह भी बताया कि यह निर्णय किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई गंभीर और व्यावहारिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
राजजात समिति के अनुसार यात्रा स्थगित करने का सबसे बड़ा कारण व्यवस्थागत और तैयारियों से जुड़ी चुनौतियाँ हैं। नंदा देवी राजजात यात्रा लगभग 280 किलोमीटर लंबी होती है और यह दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों, ऊँचे दर्रों, बर्फीले ग्लेशियरों और संकरे पहाड़ी रास्तों से होकर गुजरती है। यात्रा मार्ग पर बुनियादी ढांचे, सड़क, संचार व्यवस्था, चिकित्सा सुविधाओं और सुरक्षा इंतजामों को समय रहते पूरी तरह तैयार कर पाना फिलहाल संभव नहीं हो पा रहा था। समिति का मानना है कि अधूरी तैयारियों के साथ यात्रा का आयोजन श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिहाज से उचित नहीं होता।
इसके अलावा अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया कि जलवायु परिवर्तन और मौसम संबंधी अनिश्चितता भी एक महत्वपूर्ण कारण है। बीते वर्षों में उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अचानक मौसम बदलने, भारी वर्षा, हिमस्खलन और भूस्खलन की घटनाएँ लगातार बढ़ी हैं। राजजात यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को 16,000 फीट से अधिक ऊँचाई तक पैदल चलना पड़ता है, ऐसे में मौसम की थोड़ी-सी भी चूक बड़े हादसे का कारण बन सकती है। समिति ने साफ कहा कि यात्रा को पूरी तरह सुरक्षित और सुव्यवस्थित बनाए बिना आयोजन करना न तो धार्मिक दृष्टि से सही है और न ही प्रशासनिक रूप से।
राजजात समिति के पदाधिकारियों ने यह भी बताया कि यात्रा के सफल आयोजन के लिए राज्य और केंद्र सरकार के कई विभागों के बीच समन्वय, पर्याप्त बजट, समयबद्ध कार्ययोजना और स्थानीय स्तर पर व्यापक तैयारियाँ आवश्यक होती हैं। वर्ष 2026 में इन सभी पहलुओं को संतोषजनक स्तर तक पूरा कर पाना कठिन दिख रहा था। इसी कारण यात्रा को एक वर्ष आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया, ताकि सभी आवश्यक कार्य योजनाबद्ध तरीके से पूरे किए जा सकें।
गौरतलब है कि नंदा देवी राजजात यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान, लोक परंपराओं और सामाजिक एकता का महापर्व है। इस यात्रा की सबसे खास बात चौसिंगा यानी चार सींग वाला खाडू (भेड़) होता है, जो पूरी यात्रा का नेतृत्व करता है। मान्यता है कि यह खाडू स्वयं देवी नंदा का प्रतीक होता है और उसी के पीछे-पीछे पूरी यात्रा आगे बढ़ती है। यात्रा में सैकड़ों गांवों के लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल होते हैं और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का निर्वहन करते हैं।
यात्रा का मार्ग नौटी गांव से शुरू होकर कर्णप्रयाग, चमोली, वेदनी बुग्याल, रूपकुंड और अंत में होमकुंड तक जाता है, जहां देवी नंदा को ससुराल विदा किया जाता है। यह विदाई केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि पहाड़ की बेटियों, मातृत्व और प्रकृति के प्रति गहरी भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक मानी जाती है। इसी वजह से राजजात यात्रा को उत्तराखंड के लोकजीवन का सबसे बड़ा आयोजन कहा जाता है।
यात्रा स्थगित होने की खबर से श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों में भले ही थोड़ी निराशा देखी जा रही हो, लेकिन समिति का कहना है कि यह फैसला दीर्घकालिक हित और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। स्थानीय लोगों का भी मानना है कि यदि यात्रा पूरी तैयारी और बेहतर व्यवस्थाओं के साथ 2027 में आयोजित होती है, तो इसका स्वरूप और अधिक भव्य, सुरक्षित और यादगार होगा।
राजजात समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि वर्ष 2027 के लिए यात्रा की तैयारियाँ समय रहते शुरू की जाएँगी और सभी संबंधित विभागों, स्थानीय पंचायतों, धार्मिक संस्थाओं और स्वयंसेवी संगठनों को साथ लेकर एक विस्तृत कार्ययोजना बनाई जाएगी। साथ ही यात्रा मार्ग पर पर्यावरण संरक्षण, कचरा प्रबंधन और स्थानीय संस्कृति के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, ताकि हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को किसी भी प्रकार का नुकसान न पहुँचे।
कुल मिलाकर, नंदा देवी राजजात यात्रा 2026 का स्थगन एक कठिन लेकिन दूरदर्शी निर्णय माना जा रहा है। अब श्रद्धालुओं की निगाहें वर्ष 2027 पर टिकी हैं, जब हिमालय की गोद में एक बार फिर आस्था, परंपरा और संस्कृति का यह महाकुंभ साकार होगा और माँ नंदा के जयकारों से पर्वत श्रृंखलाएँ गूंज उठेंगी।