Spread the loveदेहरादून (उत्तराखंड) उत्तराखंड में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद सामने आया है, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों स्तर पर मिलने वाली निःशुल्क जांच सेवाओं में कटौती कर दी गई है। राज्य में विटामिन बी-12 और विटामिन डी-3 जैसी बेहद महत्वपूर्ण जांचों को फ्री सूची से बाहर कर दिए जाने के बाद ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ने की आशंका गहराने लगी है। यह मामला सिर्फ एक तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि सीधे तौर पर आम जनता की सेहत और उनकी जेब से जुड़ा हुआ है।राज्य में यह बदलाव ऐसे समय में हुआ है जब पहले से ही बड़ी आबादी पोषण संबंधी समस्याओं से जूझ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार विटामिन बी-12 और डी-3 की कमी उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश में तेजी से बढ़ रही है, और इसका सीधा असर थकान, कमजोरी, हड्डियों में दर्द और मानसिक स्वास्थ्य तक पर देखा जा रहा है। ऐसे में इन जांचों को निःशुल्क सेवाओं से हटाना एक गंभीर बहस का विषय बन गया है।वर्ष 2021 में शुरू हुई थी महत्वाकांक्षी निःशुल्क जांच योजनाउत्तराखंड सरकार ने वर्ष 2021 में जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से निःशुल्क स्वास्थ्य जांच योजना की शुरुआत की थी। इस योजना का शुभारंभ मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami द्वारा 12 अगस्त 2021 को किया गया था। शुरुआत में इस योजना को राज्य के 254 चिकित्सा संस्थानों में लागू किया गया था।इस योजना के अंतर्गत शुरुआती चरण में 208 प्रकार की विभिन्न जांचें निःशुल्क उपलब्ध कराई गई थीं, जिन्हें बाद में बढ़ाकर 266 तक कर दिया गया। इन जांचों में बायोकेमिस्ट्री, हेमेटोलॉजी, हार्मोन, इम्यूनोलॉजी, ट्यूमर मार्कर और विटामिन संबंधी जांचें शामिल थीं।इस पूरी व्यवस्था को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत पीपीपी मोड पर संचालित किया जा रहा था, जिसमें एक निजी संस्था चंदन हेल्थकेयर को जिम्मेदारी दी गई थी। यह व्यवस्था जिला अस्पतालों से लेकर उप-जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक लागू थी।अब क्यों बंद हुई B12 और D3 जैसी जांचेंहाल ही में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों स्तर पर विटामिन बी-12 और डी-3 जैसी जांचों को निःशुल्क सूची से हटा दिया गया है। हालांकि जिला और उप-जिला अस्पतालों में यह सुविधा अभी भी उपलब्ध है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है।सूत्रों के अनुसार, इस योजना का संचालन कर रही निजी एजेंसी का कार्यकाल 31 मई को समाप्त होने जा रहा है, जिसके चलते कई सेवाओं में अस्थायी या आंशिक बदलाव किए गए हैं। इसी के तहत कुछ महत्वपूर्ण जांचों को फिलहाल प्राथमिक स्तर पर बंद कर दिया गया है।स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि व्यवस्थाओं को पुनर्गठित किया जा रहा है और आने वाले समय में सेवा प्रणाली को और बेहतर बनाने पर काम किया जाएगा। इस संबंध में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री Subodh Uniyal ने कहा कि यदि व्यवस्थाएं गड़बड़ाती हैं तो उन्हें सुधारा भी जाता है और वर्तमान में सुधार की प्रक्रिया जारी है।ग्रामीण जनता पर सबसे बड़ा असरइस निर्णय का सबसे अधिक असर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर पड़ने की संभावना है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में बड़ी आबादी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर ही निर्भर रहती है। ऐसे में जब बी-12 और डी-3 जैसी जांचें बंद हो जाती हैं तो लोगों को मजबूरी में जिला अस्पताल या निजी लैब की ओर रुख करना पड़ता है।निजी पैथोलॉजी लैब में इन जांचों की कीमत लगभग 700 रुपये से लेकर 1500 रुपये तक होती है। यह खर्च गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए अतिरिक्त बोझ बन जाता है। खासकर ऐसे समय में जब पहले से ही दवाइयों और इलाज की लागत बढ़ रही है, यह निर्णय आम जनता की परेशानी को और बढ़ा सकता है।विटामिन B12 और D3 की कमी क्यों बन रही गंभीर समस्याचिकित्सकों के अनुसार विटामिन बी-12 की कमी शरीर में कई प्रकार की समस्याएं पैदा कर सकती है। इसमें लगातार थकान, कमजोरी, हाथ-पैरों में झुनझुनी, याददाश्त में कमी और मानसिक एकाग्रता में कमी शामिल है। वहीं विटामिन डी-3 की कमी से हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों में ऐंठन, लगातार थकावट, डिप्रेशन और बाल झड़ने जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं।चिकित्सक Dr Ravindra Rana का कहना है कि आज के समय में लगभग हर दूसरे व्यक्ति में इन दोनों विटामिन की कमी देखी जा रही है। इसका मुख्य कारण खराब जीवनशैली, धूप की कमी और खानपान में पोषक तत्वों की कमी है।विशेषज्ञों के अनुसार इस स्थिति में समय-समय पर जांच बेहद जरूरी है ताकि बीमारी को शुरुआती स्तर पर ही नियंत्रित किया जा सके। लेकिन जब यही जांचें निःशुल्क व्यवस्था से हट जाती हैं तो लोग जांच कराने से बचने लगते हैं, जिससे समस्या और गंभीर हो सकती है।स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंतास्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि निःशुल्क जांच योजनाएं सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। खासकर पहाड़ी राज्यों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं, वहां ऐसी योजनाएं जीवन रक्षक साबित होती हैं।विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगर प्राथमिक स्तर पर जांचें बंद होती हैं तो इसका सीधा असर बीमारी के शुरुआती पहचान पर पड़ेगा। इससे मरीजों की स्थिति गंभीर होने पर ही इलाज शुरू होगा, जो आगे चलकर स्वास्थ्य प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।सरकार का पक्ष और भविष्य की योजनाराज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था को और मजबूत करने की दिशा में काम किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की निदेशक Dr Rashmi Pant ने बताया कि निःशुल्क जांच सेवाओं की मॉनिटरिंग को और बेहतर किया जा रहा है ताकि किसी भी मरीज को निजी लैब पर निर्भर न रहना पड़े।सरकार का दावा है कि हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम को मजबूत किया जा रहा है, जिससे ओपीडी और आईपीडी स्तर पर मरीजों की स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा सके। साथ ही यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि भविष्य में जांच सेवाओं में किसी प्रकार की कमी न हो।आम जनता की प्रतिक्रिया और सवालइस निर्णय के बाद आम जनता में नाराजगी और चिंता दोनों देखी जा रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के लोग इसे एक आर्थिक बोझ के रूप में देख रहे हैं। लोगों का कहना है कि पहले ही स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कठिन है, और अब यदि जांचें भी मुफ्त नहीं रहेंगी तो स्थिति और मुश्किल हो जाएगी।कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस निर्णय पर सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं को और मजबूत करने की जरूरत है, न कि उन्हें सीमित करने की।उत्तराखंड में प्राथमिक स्तर पर बी-12 और डी-3 जांचों का बंद होना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि एक व्यापक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। जहां एक ओर सरकार व्यवस्था सुधार की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर आम जनता को तत्काल राहत की आवश्यकता महसूस हो रही है।ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस व्यवस्था को किस तरह पुनः मजबूत करती है और क्या वास्तव में ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को फिर से निःशुल्क और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं मिल पाती हैं या नहीं।यह मुद्दा केवल जांचों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की समग्र स्थिति को भी दर्शाता है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। Post Views: 22 Post navigationदेहरादून: सस्पेंड ड्राइविंग लाइसेंस बहाल करना हुआ मुश्किल, अब रिफ्रेशर कोर्स के बाद ही होगा एक्टिव यात्रा 2026: श्रद्धालुओं का उमड़ा जनसैलाब, 10 लाख के करीब पहुँचा आंकड़ा, केदारनाथ में सबसे अधिक भीड़