उत्तराखंड में जंगलों की आग पर बड़ा एक्शन, ‘शीतलाखेत मॉडल’ से 1000 नए वन कर्मियों की होगी भर्ती
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उत्तराखंड में हर साल गर्मियों के मौसम में जंगलों में लगने वाली आग एक बड़ी आपदा का रूप ले लेती है। पहाड़ों की हरियाली को निगलती आग न केवल लाखों पेड़ों को नष्ट कर देती है, बल्कि वन्यजीवों, पर्यावरण और ग्रामीणों के जीवन पर भी गंभीर असर डालती है। इस बार राज्य सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए बड़ा और व्यापक कदम उठाया है। मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami के नेतृत्व में अब उत्तराखंड सरकार “शीतलाखेत मॉडल” को पूरे राज्य में लागू करने जा रही है। इस मॉडल के तहत 1000 नए वन कर्मियों की भर्ती की जाएगी और स्थानीय समुदायों को जंगल बचाने के अभियान का सक्रिय हिस्सा बनाया जाएगा।

उत्तराखंड के जंगल हर साल आग की चपेट में आते हैं। गर्मियों में तापमान बढ़ने, सूखी घास, चीड़ की पत्तियों और तेज हवाओं के कारण आग तेजी से फैलती है। कई बार हालात इतने खराब हो जाते हैं कि आग गांवों तक पहुंचने लगती है और लोगों को अपने घर छोड़ने पड़ते हैं। बीते वर्षों में पौड़ी गढ़वाल, अल्मोड़ा, नैनीताल, चंपावत और टिहरी जैसे कई जिलों में बड़े पैमाने पर जंगल जल चुके हैं। इससे पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ और वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी प्रभावित हुआ।

सरकार का मानना है कि जंगलों की आग पर काबू पाने के लिए केवल सरकारी मशीनरी पर्याप्त नहीं है। जब तक स्थानीय लोग और गांव स्तर पर टीमें सक्रिय नहीं होंगी, तब तक आग पर शुरुआती समय में नियंत्रण पाना मुश्किल रहेगा। इसी सोच के साथ “शीतलाखेत मॉडल” को लागू किया जा रहा है।

अल्मोड़ा जिले के Sheetlakhet क्षेत्र में कुछ समय पहले ग्रामीणों ने सामूहिक प्रयासों से जंगलों को आग से बचाने का अनोखा उदाहरण पेश किया था। वहां स्थानीय लोगों ने बिना किसी बड़े सरकारी संसाधन के मिलकर आग बुझाने का अभियान चलाया और जंगलों को भारी नुकसान से बचा लिया। ग्रामीण रातभर जंगलों में डटे रहे और आग को फैलने से रोक दिया। इस मॉडल ने पूरे राज्य में चर्चा बटोरी और अब सरकार इसे राज्यव्यापी रणनीति के रूप में लागू करने जा रही है।

इस योजना का सबसे बड़ा लक्ष्य आग लगने के शुरुआती मिनटों में तुरंत कार्रवाई करना है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आग को शुरुआती चरण में रोक लिया जाए तो बड़े विनाश से बचा जा सकता है। इसी के लिए गांव स्तर पर त्वरित प्रतिक्रिया टीमें बनाई जाएंगी। इन टीमों में स्थानीय युवाओं, वन पंचायतों, महिला मंगल दलों और प्रशिक्षित स्वयंसेवकों को शामिल किया जाएगा।

राज्य सरकार ने घोषणा की है कि वन विभाग में 1000 नए कर्मियों की भर्ती की जाएगी। इन कर्मचारियों को विशेष रूप से फॉरेस्ट फायर मैनेजमेंट के लिए तैयार किया जाएगा। उन्हें आधुनिक उपकरण, सुरक्षा किट और आग बुझाने की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाएगा। कई क्षेत्रों में फायर लाइन तैयार की जाएगी ताकि आग को आगे बढ़ने से रोका जा सके।

सरकार इस योजना में महिलाओं की भागीदारी को भी अहम मान रही है। उत्तराखंड के गांवों में महिला मंगल दल लंबे समय से सामाजिक और पर्यावरणीय गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। अब इन्हें जंगलों की सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी भी दी जाएगी। सरकार का मानना है कि स्थानीय महिलाओं की भागीदारी से जंगलों की सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत होगी।

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार राज्य के कई दूरस्थ क्षेत्रों में समय पर संसाधन नहीं पहुंच पाने के कारण आग विकराल रूप ले लेती है। नई भर्तियों और स्थानीय नेटवर्क के जरिए इस समस्या को कम करने की कोशिश की जाएगी। जंगलों में आधुनिक संचार व्यवस्था और निगरानी प्रणाली को भी मजबूत किया जाएगा ताकि आग की सूचना तुरंत मिल सके।

विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में बढ़ती फॉरेस्ट फायर की घटनाएं जलवायु परिवर्तन का भी संकेत हैं। तापमान में लगातार बढ़ोतरी और कम होती नमी जंगलों को अधिक संवेदनशील बना रही है। ऐसे में सिर्फ सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि समाज और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी जरूरी होगी। “शीतलाखेत मॉडल” को इसी दिशा में एक मजबूत पहल माना जा रहा है।

सरकार का दावा है कि यह योजना सिर्फ जंगलों को आग से बचाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। स्थानीय युवाओं को वन सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण से जोड़कर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। साथ ही ग्रामीणों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी।

उत्तराखंड की पहचान उसकी हरियाली, नदियों और प्राकृतिक सुंदरता से है। यदि जंगल सुरक्षित रहेंगे तो पर्यावरण संतुलन भी बना रहेगा और आने वाली पीढ़ियों को भी स्वच्छ वातावरण मिल सकेगा। ऐसे में “शीतलाखेत मॉडल” को उत्तराखंड के लिए सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण का बड़ा अभियान माना जा रहा है।

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