उत्तराखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: रद्द भर्ती परीक्षा में बेदाग होने से नहीं मिलेगा नौकरी का अधिकार
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देहरादून, दैनिक प्रभातवाणी।

उत्तराखंड हाई कोर्ट ने सरकारी भर्तियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी रद्द की गई भर्ती परीक्षा में अभ्यर्थी का निर्दोष या बेदाग साबित होना उसे स्वतः सरकारी नौकरी पाने का कानूनी अधिकार नहीं देता। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी भर्ती प्रक्रिया को धांधली, अनियमितताओं या अन्य वैधानिक कारणों से निरस्त किया जाता है, तो उस प्रक्रिया के आधार पर कोई भी उम्मीदवार नियुक्ति का दावा नहीं कर सकता।

यह महत्वपूर्ण फैसला मधु बाला बनाम उत्तराखंड राज्य एवं अन्य (रिट याचिका सेवा एकल संख्या 1571/2026) मामले में आया है। मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि जांच में उनके खिलाफ किसी भी प्रकार की संलिप्तता या अनियमितता साबित नहीं हुई है, इसलिए उन्हें नियुक्ति का लाभ मिलना चाहिए। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी भर्ती परीक्षा को पूरी तरह निरस्त कर दिया गया है, तो उससे जुड़ी सभी अपेक्षाएं और संभावित दावे स्वतः समाप्त हो जाते हैं। केवल यह तथ्य कि कोई अभ्यर्थी गड़बड़ी में शामिल नहीं था, उसे नियुक्ति का वैधानिक या अर्जित अधिकार प्रदान नहीं करता। सरकारी नौकरी में नियुक्ति का अधिकार तभी उत्पन्न होता है, जब अभ्यर्थी वैध और प्रभावी चयन प्रक्रिया के माध्यम से अंतिम रूप से चयनित हो।

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में रिक्त पदों को भरने के लिए जारी किए गए विज्ञापन और आयोजित की गई चयन परीक्षाएं पूरी तरह स्वतंत्र प्रक्रियाएं होती हैं। ऐसे में सभी पात्र अभ्यर्थियों को समान अवसर के सिद्धांत के तहत नई भर्ती प्रक्रिया में भाग लेना होगा और उसी के आधार पर उनका भविष्य तय होगा। अदालत ने कहा कि नई चयन परीक्षा में सफलता प्राप्त करना ही सरकारी नियुक्ति का एकमात्र वैधानिक आधार है।

न्यायालय ने चयन आयोग द्वारा अभ्यर्थियों के दावों को अस्वीकार करने के निर्णय को भी उचित और कानून के अनुरूप माना। कोर्ट ने कहा कि आयोग का फैसला न तो मनमाना था और न ही भेदभावपूर्ण। इसके विपरीत, यह निर्णय पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा के लिए आवश्यक था।

अपने फैसले में हाई कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि न्यायपालिका राज्य सरकार को किसी भी अभ्यर्थी को “पिछले दरवाजे” या विशेष रियायत देकर नियुक्ति देने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। सरकारी सेवाओं में अवसर की समानता, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और नियमों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता है, इसलिए किसी रद्द भर्ती प्रक्रिया के आधार पर नियुक्ति देने का निर्देश देना संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवादों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा। यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि किसी निरस्त भर्ती परीक्षा में शामिल अभ्यर्थियों की निर्दोषता अपने आप में नौकरी का अधिकार नहीं बनाती। सरकारी सेवा में प्रवेश का वैधानिक मार्ग केवल नई, पारदर्शी और विधिसम्मत चयन प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव है।

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