Spread the loveकांवड़ यात्रा में QR कोड को लेकर बवाल, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों को तलब किया, 1 सप्ताह में मांगा जवाबनई दिल्ली | 16 जुलाई 2025 | दैनिक प्रभातवाणी ब्यूरो रिपोर्टश्रावण माह के अवसर पर चल रही कांवड़ यात्रा में इस बार एक अनोखा और तकनीकी विवाद सामने आया है। यह विवाद है — श्रद्धालुओं की पहचान के लिए लगाए गए QR कोड स्कैनिंग सिस्टम को लेकर, जिसे कुछ जिलों में प्रशासन द्वारा लागू किया गया है। इस व्यवस्था के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत में याचिका दाखिल की गई, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों से एक सप्ताह के भीतर स्पष्ट और विस्तृत जवाब मांगा है।क्या है यह QR कोड विवाद?कांवड़ यात्रा में इस बार कई जिलों में प्रशासन ने श्रद्धालुओं के लिए QR कोड आधारित पंजीकरण प्रणाली शुरू की है। इसका उद्देश्य था:भीड़ का सुगम प्रबंधनसुरक्षा की निगरानीअसामाजिक तत्वों पर नियंत्रणआपातकालीन सहायता को त्वरित बनानापरंतु, जब यह प्रणाली कुछ जिलों में अनिवार्य कर दी गई, तो कई सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और श्रद्धालुओं ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ करार देते हुए विरोध जताया। उनका कहना है कि:यह प्रणाली आम श्रद्धालुओं के लिए तकनीकी रूप से जटिल है।धार्मिक आस्था के बीच में प्रशासनिक हस्तक्षेप का यह उदाहरण है।कई स्थानों पर बिना QR कोड वाले कांवड़ियों को यात्रा में आगे बढ़ने से रोक दिया गया।कतारों और जाँच के नाम पर कई जगह अव्यवस्था पैदा हुई।सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और सरकारों से सवालइस मामले में याचिका कांवड़ियों की ओर से दाखिल की गई थी। सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए कहा:“किसी धार्मिक यात्रा में तकनीकी अवरोधों और प्रशासनिक जटिलताओं को इस हद तक लागू करना क्या धर्म की स्वतंत्रता पर अंकुश नहीं है?”सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे इस बात की साफ जानकारी दें:QR कोड प्रणाली लागू करने का कानूनी आधार क्या है?किन जिलों में यह प्रणाली अनिवार्य की गई?क्या इस व्यवस्था से श्रद्धालुओं के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है?QR कोड स्कैनिंग का डाटा कैसे और किस उद्देश्य से संग्रहित किया जा रहा है?सरकारों का पक्ष: “QR कोड सुरक्षा का आधुनिक उपाय”हालांकि अदालत में अब तक उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों की ओर से औपचारिक जवाब दाखिल नहीं किया गया है, लेकिन प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि:QR कोड से श्रद्धालुओं की संख्या का पूर्व अनुमान मिलता है, जिससे सड़क सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य, और अस्थाई शिविरों की तैयारी बेहतर की जा सकती है।यदि किसी आपातकाल में कोई कांवड़िया बीमार पड़ जाए या गुम हो जाए, तो उसका डिजिटल प्रोफाइल तुरंत मिल सकता है।यह तकनीक अनिवार्य नहीं बल्कि “सुझाव आधारित” है, हालांकि कुछ संवेदनशील मार्गों पर इसे अधिक उपयोगी मानते हुए प्रोत्साहित किया गया।ग्राउंड रिपोर्ट: श्रद्धालुओं की क्या है राय?दैनिक प्रभातवाणी संवाददाता ने हरिद्वार, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और मुरादाबाद जिलों में यात्रा कर श्रद्धालुओं से बात की। उनके अनुभव मिले-जुले रहे:🔹 राजेश पंडित (मेरठ):“हम पिछले 8 वर्षों से कांवड़ लाते हैं, पर इस बार स्कैनिंग, लाइन और मोबाइल में परेशानी आई। कई साथी तो QR कोड के झंझट में उलझकर पीछे छूट गए।”🔹 नूर हसन (बुलंदशहर):“प्रशासन अगर सुरक्षा के लिए कुछ कर रहा है तो ठीक है, पर ज़बरदस्ती न हो। सबको तकनीक नहीं आती।”🔹 महिला श्रद्धालुओं की चिंता:“लाइन में देर, स्कैनिंग में भीड़ और गर्मी में चक्कर — यह सब QR सिस्टम के कारण बढ़ा है।”धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रिया:विश्व हिंदू परिषद (VHP), अखाड़ा परिषद, और कुछ मंदिर समितियों ने भी इस व्यवस्था को “आस्था पर अंकुश” बताया है।उनका तर्क है कि QR कोड व्यवस्था में ऐसा प्रतीत होता है कि श्रद्धालु अपराधी हों, जिनकी हर गतिविधि ट्रैक की जा रही हो।कई संतों ने इसे “धार्मिक स्वतंत्रता पर सरकारी निगरानी” करार दिया है।अगली सुनवाई और संभावनाएं:सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि 23 जुलाई 2025 तक दोनों राज्य सरकारों को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। यदि जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो अदालत आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।पृष्ठभूमि में क्यों बढ़ रहा है प्रशासनिक हस्तक्षेप?बीते कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा में भारी भीड़, सड़क हादसे, विवाद, और संभावित आतंकी खतरे की सूचनाओं के चलते प्रशासन ज्यादा सतर्क हुआ है।2023 और 2024 में कई ऐसे मामले सामने आए जहां भीड़ नियंत्रण न होने से अव्यवस्था हुई थी।इसके जवाब में 2025 में डिजिटल ट्रैकिंग, सीसीटीवी निगरानी, ड्रोन कैमरा, और QR कोड रजिस्ट्रेशन जैसी व्यवस्था लाई गई।दैनिक प्रभातवाणी : धर्म और तकनीक के टकराव की परीक्षाकांवड़ यात्रा भारतीय संस्कृति और श्रद्धा का बड़ा पर्व है, जिसमें करोड़ों लोग भाग लेते हैं। सरकारों की जिम्मेदारी है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करें, लेकिन साथ ही उनकी आस्था और स्वतंत्रता का भी सम्मान हो।इस विवाद ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या तकनीकी समाधान धार्मिक आस्थाओं पर भारी पड़ सकते हैं?या क्या यह एक ऐसा कदम है जो समय के साथ धार्मिक आयोजनों को अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित बना सकता है?अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी है, जो शायद भविष्य में धर्म बनाम तकनीक की बहस की दिशा तय करेगा Post Views: 114 Post navigationमुवानी के समीप सूनि पुल क्षेत्र में हादसा : खाई में गिरी बोलेरो, 8 की मौत, 3 गंभीर घायल शिक्षा में श्रीमद्भगवद्गीता की एंट्री पर घमासान – विरोध में शिक्षक और विपक्ष
कांवड़ यात्रा में QR कोड को लेकर बवाल, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों को तलब किया, 1 सप्ताह में मांगा जवाबनई दिल्ली | 16 जुलाई 2025 | दैनिक प्रभातवाणी ब्यूरो रिपोर्टश्रावण माह के अवसर पर चल रही कांवड़ यात्रा में इस बार एक अनोखा और तकनीकी विवाद सामने आया है। यह विवाद है — श्रद्धालुओं की पहचान के लिए लगाए गए QR कोड स्कैनिंग सिस्टम को लेकर, जिसे कुछ जिलों में प्रशासन द्वारा लागू किया गया है। इस व्यवस्था के खिलाफ देश की सर्वोच्च अदालत में याचिका दाखिल की गई, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों से एक सप्ताह के भीतर स्पष्ट और विस्तृत जवाब मांगा है।क्या है यह QR कोड विवाद?कांवड़ यात्रा में इस बार कई जिलों में प्रशासन ने श्रद्धालुओं के लिए QR कोड आधारित पंजीकरण प्रणाली शुरू की है। इसका उद्देश्य था:भीड़ का सुगम प्रबंधनसुरक्षा की निगरानीअसामाजिक तत्वों पर नियंत्रणआपातकालीन सहायता को त्वरित बनानापरंतु, जब यह प्रणाली कुछ जिलों में अनिवार्य कर दी गई, तो कई सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और श्रद्धालुओं ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ करार देते हुए विरोध जताया। उनका कहना है कि:यह प्रणाली आम श्रद्धालुओं के लिए तकनीकी रूप से जटिल है।धार्मिक आस्था के बीच में प्रशासनिक हस्तक्षेप का यह उदाहरण है।कई स्थानों पर बिना QR कोड वाले कांवड़ियों को यात्रा में आगे बढ़ने से रोक दिया गया।कतारों और जाँच के नाम पर कई जगह अव्यवस्था पैदा हुई।सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी और सरकारों से सवालइस मामले में याचिका कांवड़ियों की ओर से दाखिल की गई थी। सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए कहा:“किसी धार्मिक यात्रा में तकनीकी अवरोधों और प्रशासनिक जटिलताओं को इस हद तक लागू करना क्या धर्म की स्वतंत्रता पर अंकुश नहीं है?”सुप्रीम कोर्ट ने दोनों राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे इस बात की साफ जानकारी दें:QR कोड प्रणाली लागू करने का कानूनी आधार क्या है?किन जिलों में यह प्रणाली अनिवार्य की गई?क्या इस व्यवस्था से श्रद्धालुओं के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है?QR कोड स्कैनिंग का डाटा कैसे और किस उद्देश्य से संग्रहित किया जा रहा है?सरकारों का पक्ष: “QR कोड सुरक्षा का आधुनिक उपाय”हालांकि अदालत में अब तक उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों की ओर से औपचारिक जवाब दाखिल नहीं किया गया है, लेकिन प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि:QR कोड से श्रद्धालुओं की संख्या का पूर्व अनुमान मिलता है, जिससे सड़क सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य, और अस्थाई शिविरों की तैयारी बेहतर की जा सकती है।यदि किसी आपातकाल में कोई कांवड़िया बीमार पड़ जाए या गुम हो जाए, तो उसका डिजिटल प्रोफाइल तुरंत मिल सकता है।यह तकनीक अनिवार्य नहीं बल्कि “सुझाव आधारित” है, हालांकि कुछ संवेदनशील मार्गों पर इसे अधिक उपयोगी मानते हुए प्रोत्साहित किया गया।ग्राउंड रिपोर्ट: श्रद्धालुओं की क्या है राय?दैनिक प्रभातवाणी संवाददाता ने हरिद्वार, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और मुरादाबाद जिलों में यात्रा कर श्रद्धालुओं से बात की। उनके अनुभव मिले-जुले रहे:🔹 राजेश पंडित (मेरठ):“हम पिछले 8 वर्षों से कांवड़ लाते हैं, पर इस बार स्कैनिंग, लाइन और मोबाइल में परेशानी आई। कई साथी तो QR कोड के झंझट में उलझकर पीछे छूट गए।”🔹 नूर हसन (बुलंदशहर):“प्रशासन अगर सुरक्षा के लिए कुछ कर रहा है तो ठीक है, पर ज़बरदस्ती न हो। सबको तकनीक नहीं आती।”🔹 महिला श्रद्धालुओं की चिंता:“लाइन में देर, स्कैनिंग में भीड़ और गर्मी में चक्कर — यह सब QR सिस्टम के कारण बढ़ा है।”धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रिया:विश्व हिंदू परिषद (VHP), अखाड़ा परिषद, और कुछ मंदिर समितियों ने भी इस व्यवस्था को “आस्था पर अंकुश” बताया है।उनका तर्क है कि QR कोड व्यवस्था में ऐसा प्रतीत होता है कि श्रद्धालु अपराधी हों, जिनकी हर गतिविधि ट्रैक की जा रही हो।कई संतों ने इसे “धार्मिक स्वतंत्रता पर सरकारी निगरानी” करार दिया है।अगली सुनवाई और संभावनाएं:सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि 23 जुलाई 2025 तक दोनों राज्य सरकारों को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। यदि जवाब संतोषजनक नहीं हुआ, तो अदालत आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।पृष्ठभूमि में क्यों बढ़ रहा है प्रशासनिक हस्तक्षेप?बीते कुछ वर्षों में कांवड़ यात्रा में भारी भीड़, सड़क हादसे, विवाद, और संभावित आतंकी खतरे की सूचनाओं के चलते प्रशासन ज्यादा सतर्क हुआ है।2023 और 2024 में कई ऐसे मामले सामने आए जहां भीड़ नियंत्रण न होने से अव्यवस्था हुई थी।इसके जवाब में 2025 में डिजिटल ट्रैकिंग, सीसीटीवी निगरानी, ड्रोन कैमरा, और QR कोड रजिस्ट्रेशन जैसी व्यवस्था लाई गई।दैनिक प्रभातवाणी : धर्म और तकनीक के टकराव की परीक्षाकांवड़ यात्रा भारतीय संस्कृति और श्रद्धा का बड़ा पर्व है, जिसमें करोड़ों लोग भाग लेते हैं। सरकारों की जिम्मेदारी है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करें, लेकिन साथ ही उनकी आस्था और स्वतंत्रता का भी सम्मान हो।इस विवाद ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या तकनीकी समाधान धार्मिक आस्थाओं पर भारी पड़ सकते हैं?या क्या यह एक ऐसा कदम है जो समय के साथ धार्मिक आयोजनों को अधिक व्यवस्थित और सुरक्षित बना सकता है?अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी है, जो शायद भविष्य में धर्म बनाम तकनीक की बहस की दिशा तय करेगा