पहाड़ों में गहराया जल संकट, मैदानी इलाकों में सूखी धरती और गिरता भूजल स्तर
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देवभूमि Uttarakhand इन दिनों गंभीर जल संकट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। पहाड़ों में पारंपरिक जलस्रोत सूखने लगे हैं, जबकि मैदानी जिलों में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। गर्मी बढ़ने के साथ प्रदेश के कई गांवों और शहरों में पेयजल संकट गहराने लगा है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में लोग कई किलोमीटर दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं, जबकि मैदानी इलाकों में बोरवेल और ट्यूबवेल का पानी भी तेजी से नीचे खिसक रहा है। विशेषज्ञ इसे आने वाले समय के लिए बड़ा खतरा मान रहे हैं।

सबसे चिंताजनक स्थिति Uttarkashi जिले के संग्राली गांव में देखने को मिल रही है, जहां पिछले करीब 20 दिनों से पेयजल आपूर्ति पूरी तरह बंद पड़ी है। गांव के लोगों को प्राकृतिक जल स्रोतों और दूरस्थ इलाकों से पानी लाना पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि करोड़ों रुपए की लागत से बनाई गई पेयजल योजना हर साल गर्मियों में जवाब दे देती है। पाइपलाइन क्षतिग्रस्त होने और जल स्रोतों के सूखने के कारण गांव में पानी की भारी किल्लत हो गई है। महिलाओं और बच्चों को घंटों पैदल चलकर पानी ढोना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द समस्या का समाधान नहीं हुआ तो आंदोलन किया जाएगा।

स्थिति केवल उत्तरकाशी तक सीमित नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे उत्तराखंड में करीब 1060 ऐसे क्षेत्र चिन्हित किए गए हैं जहां गंभीर पेयजल संकट बना हुआ है। इनमें 691 ग्रामीण और 369 शहरी क्षेत्र शामिल हैं। सबसे अधिक प्रभावित जिलों में Nainital, Dehradun, Pauri Garhwal, Pithoragarh और Tehri Garhwal प्रमुख हैं। कई क्षेत्रों में लोग टैंकरों और निजी साधनों के सहारे पानी जुटाने को मजबूर हैं।

मैदानी जिलों में भी हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं। खासकर देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर में भूजल का अंधाधुंध दोहन गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। तेजी से बढ़ती आबादी, अनियोजित शहरीकरण, होटल और व्यावसायिक गतिविधियों के विस्तार के कारण पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। बड़ी संख्या में नए बोरवेल और ट्यूबवेल खोदे जा रहे हैं, जिससे भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। भूवैज्ञानिकों का कहना है कि पहले जो पानी 10 मीटर की गहराई पर उपलब्ध होता था, वह अब 20 मीटर या उससे अधिक नीचे पहुंच चुका है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि बदलता जलवायु पैटर्न भी इस संकट का बड़ा कारण है। पहले जहां लंबे समय तक हल्की और नियमित बारिश होती थी, वहीं अब कम समय में अत्यधिक बारिश हो रही है। इससे पानी जमीन में समाने के बजाय तेजी से बह जाता है और भूजल रिचार्ज नहीं हो पाता। सर्दियों में कम बर्फबारी और कम वर्षा के कारण भी पारंपरिक जल स्रोतों को पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा। इसका सीधा असर नौलों, धारों और प्राकृतिक झरनों पर पड़ रहा है, जो अब तेजी से सूख रहे हैं।

पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक जल स्रोतों की उपेक्षा भी संकट को बढ़ा रही है। कभी गांवों की जीवनरेखा माने जाने वाले नौले और धारे अब या तो सूख चुके हैं या उनकी साफ-सफाई और संरक्षण नहीं हो पा रहा। कई गांवों में पाइपलाइन तो पहुंच गई, लेकिन नियमित जलापूर्ति आज भी सपना बनी हुई है। जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं पर काम जारी है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में इन योजनाओं की गति अपेक्षा से धीमी मानी जा रही है।

राज्य सरकार ने हाल ही में भूजल दोहन को नियंत्रित करने के लिए नए नियम लागू किए हैं। गैर कृषि कार्यों के लिए भूजल उपयोग पर शुल्क लगाने का फैसला लिया गया है। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और बड़े संस्थानों के लिए अलग-अलग श्रेणियों में शुल्क निर्धारित किया गया है। इसके साथ ही कई क्षेत्रों में भूजल उपयोग के लिए एनओसी अनिवार्य की गई है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनका सख्ती से पालन कराना भी जरूरी है।

जल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के कई हिस्सों में जल संकट विकराल रूप ले सकता है। वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना, पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण, अवैध बोरवेल पर कार्रवाई और जल संरक्षण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाना अब बेहद जरूरी हो गया है। उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में पानी केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन का आधार है। ऐसे में जल संरक्षण को केवल सरकारी योजना नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

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