देहरादून में करोड़ों का भूमि-रजिस्ट्री घोटाला उजागर, DM की छापेमारी में खुला बड़ा नेक्सस
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Dehradun और उसके आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में सामने आया भूमि और रजिस्ट्री घोटाला अब बड़े प्रशासनिक और आर्थिक घोटाले के रूप में उभरता जा रहा है। शुरुआती जांच में करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान, दस्तावेजों में हेरफेर और संगठित मिलीभगत के संकेत मिले हैं। जिलाधिकारी Savin Bansal की हालिया छापेमारी के बाद पूरे मामले ने तूल पकड़ लिया है।

औद्योगिक जमीन को दिखाया गया आवासीय

जांच में सामने आया है कि Vikasnagar, Jhajra, Sahaspur और Selakui जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में बड़े भूखंडों को कागजों में छोटे-छोटे प्लॉट में बांट दिया गया। इसके बाद भारी स्टांप शुल्क से बचने के लिए इन जमीनों को औद्योगिक के बजाय आवासीय श्रेणी में दिखाकर रजिस्ट्रियां कराई गईं।

प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार इस खेल के जरिए सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान पहुंचाया गया। कई मामलों में जमीन की वास्तविक श्रेणी बदले बिना ही दस्तावेजों में बदलाव कर दिए गए।

सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर के आरोप

जांच के दौरान कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। आरोप है कि सरकारी रिकॉर्ड में ओवरराइटिंग की गई, मूल विलेख पत्रों को गायब किया गया और कई फाइलों को वर्षों तक दबाकर रखा गया। बिना भूमि श्रेणी सत्यापन और सक्षम अनुमति के सीधे रजिस्ट्रेशन काउंटर से रजिस्ट्री पास किए जाने के भी आरोप लगे हैं।

जिलाधिकारी की औचक जांच में वर्ष 2018 से 2025 तक के कई मूल दस्तावेज संदिग्ध परिस्थितियों में दबे मिले। प्रशासन अब यह पता लगाने में जुटा है कि इतने वर्षों तक फाइलें क्यों रोकी गईं और किसके निर्देश पर कार्रवाई नहीं हुई।

104 मामलों की समीक्षा, 24 में FIR के आदेश

Vinay Shankar Pandey ने पूरे मामले को गंभीर मानते हुए भूमि धोखाधड़ी से जुड़े 104 मामलों की समीक्षा की है। इनमें से 24 मामलों में तत्काल एफआईआर दर्ज करने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।

प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती जांच में यह मामला केवल लापरवाही का नहीं बल्कि संगठित भ्रष्टाचार का प्रतीत हो रहा है। कई अधिकारियों, बिचौलियों और जमीन कारोबारियों की भूमिका जांच के दायरे में आ गई है।

जमीन माफिया और अधिकारियों की मिलीभगत के संकेत

प्राथमिक जांच रिपोर्ट में संकेत मिले हैं कि पूरा खेल एक संगठित नेटवर्क के जरिए संचालित किया गया। इसमें कथित तौर पर जमीन माफिया, बिचौलिए और रजिस्ट्री कार्यालय से जुड़े कुछ अधिकारियों की मिलीभगत सामने आ रही है। जांच एजेंसियां अब आर्थिक लेनदेन, फर्जी दस्तावेजों और रजिस्ट्री प्रक्रिया में शामिल लोगों की भूमिका खंगाल रही हैं।

सूत्रों के मुताबिक कई मामलों में बाजार मूल्य से बेहद कम कीमत दिखाकर रजिस्ट्री की गई ताकि स्टांप शुल्क कम देना पड़े। इससे सरकारी खजाने को बड़ा नुकसान हुआ।

बड़े खुलासों की संभावना

प्रशासन का मानना है कि आने वाले दिनों में जांच और तेज हो सकती है तथा कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं। राजस्व विभाग, पुलिस और प्रशासनिक टीमें पुराने रिकॉर्ड की दोबारा जांच कर रही हैं। यदि आरोप सही साबित होते हैं तो कई अधिकारियों और जमीन कारोबारियों पर कानूनी कार्रवाई तय मानी जा रही है।

इस मामले ने उत्तराखंड में भूमि प्रबंधन और रजिस्ट्री व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इस तरह के नेटवर्क पर कार्रवाई नहीं की गई तो भविष्य में सरकारी जमीनों और राजस्व व्यवस्था को और बड़ा नुकसान हो सकता है।

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